सोमवार, 22 सितंबर 2014

सीसैट विवाद के अनदेखे पहलू

सिविल सेवा परीक्षा में 2011 से लागू हुए सीसैट के विरोध में जो आंदोलन इस साल उठ खड़ा हुआ है उसमें भारतीय लोकतंत्र में समाज के सभी तबकों की भागीदारी के सवाल से जुड़ा आंदोलन बनने की संभावना मौजूद है। इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस संभावना को यथार्थ में बदलने की लिए जो इच्छाशक्‍ति चाहिए वह अभी हमारे समाज और राजनीति में मौजूद नहीं है। हालाँकि इस मुद्दे पर समाज के प्रगतिशील तबके को संगठित करने के प्रयास को जारी रखने का अपना अलग महत्व है। हाल के दशकों में भाषा के मसले को जिस मज़बूती से इस आंदोलन में सामने रखा गया है उसकी दूसरी मिसाल शायद ही कहीं मिलेगी।

हमारे लोकतंत्र के लिए यह शर्म की बात है कि अपनी भाषाओं को सिविल सेवा परीक्षा में जगह दिलाने की कोशिश कर रहे परीक्षार्थियों को पुलिस की मार झेलनी पड़ती है। दिल्ली के मुखर्जी नगर में भारतीय सीमा की सुरक्षा करने वाले जवानों को तैनात करने के फ़ैसले की पृष्ठभूमि को समझे बिना इस आंदोलन को ठीक से समझना नामुमकिन है। मुखर्जी नगर में लड़कियों पर भी लाठियाँ बरसाई गईं। आंदोलन के इतने हिंसात्मक दमन के कारणों पर बात होनी चाहिए। एक ओर तो भाजपा के सांसद मनोज तिवारी आंदोलनकारियों को हर तरह के सहयोग का आश्‍वासन दे रहे थे, वहीं दूसरी ओर मुखर्जी नगर में पुलिस ने ऐसा माहौल बना रखा था कि आंदोलनकारी अपने कमरे से बाहर निकलने से भी डर रहे थे। आख़िर ऐसी क्या वज़ह थी कि श्याम रुद्र पाठक जैसे आंदोलनकारी के नेतृत्व में शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर रहे परीक्षार्थियों की आवाज़ को दबाने के लिए सरकार ने साम, दाम, दंड, भेद के तमाम तरीके अपना लिए? इस पर बात करने से पहले इस आंदोलन के प्रति लेकर सरकार और राजनीतिक दलों के रवैये पर नज़र डालते हैं।

पहले सरकार ने इस आंदोलन की अनदेखी करने की रणनीति अपनाई थी। जब मुखर्जी नगर और आस-पास के इलाकों से सैकड़ों आंदोलनकारी कड़ी धूप में चलकर रेसकोर्स गए तो प्रधानमंत्री ने अपने किसी प्रतिनिधि को उनसे बात करने के लिए नहीं भेजा। बाद में जब कई राजनीतिक दलों के नेताओं ने आंदोनकारियों की माँगों का समर्थन किया तो सरकार ने रक्षात्मक मुद्रा अपना ली। इन नेताओं में आम आदमी पार्टी के योगेंद्र यादव, आनंद कुमार, जनता दल (संयुक्‍त) के शरद यादव, राष्ट्रीय जनता दल के पप्पू यादव आदि शामिल हैं। जब जयपुर, इलाहाबाद, चेन्नई, लखनऊ, पटना आदि शहरों से भी धरना-प्रदर्शन की ख़बरें आने लगीं तो सरकार के पास यह विकल्प भी नहीं बचा कि वह इस आंदोलन को दिल्ली के कुछ कोचिंग संस्थानों द्वारा प्रायोजित होने की बात कहकर इसकी अनदेखी कर सके। श्याम रुद्र पाठक ने इस आंदोलन के प्रायोजित होने की बात का खंडन करते हुए कहा कि पुलिस की लाठी खाते हुए आंदोलन करने वाले युवाओं पर इस तरह का आरोप लगाना अपने ही देश की युवाशक्‍ति का अपमान करने के समान है। उन्होंने अपने नेतृत्व में चले आंदोलन में कोचिंग संस्थानों से आर्थिक मदद मिलने की बात से इनकार किया।

आंदोलनकारियों की बड़ी सफलता यह रही कि अगस्त के पहले सप्ताह में संसदीय कार्य मंत्री वेंकैया नायडू को लोक सभा में यह कहना पड़ा कि सरकार सिविल सेवा परीक्षा को आठवीं अनुसूची में शामिल सभी भाषाओं में आयोजित करने पर विचार करेगी। लेकिन सरकार के इस आश्‍वासन पर भरोसा करना मुश्किल है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इसी सरकार ने आंदोलनकारियों की तमाम माँगों को दरकिनार करते हुए ऐसा कदम उठाया जिसका सिविल सेवा परीक्षार्थियों के लिए कोई महत्व नहीं है। सरकार ने सीसैट में अंग्रेज़ी के उन आठ सवालों को छोड़ देने का निर्देश जारी किया जिन्हें हटाने की माँग आंदोलनकारियों ने की ही नहीं थी। कोढ़ में खाज यह कि अनुवाद का स्तर इस साल भी इतना ख़राब था कि प्रतियोगियों का कीमती वक्‍त सवालों को समझने में ही बर्बाद हो गया। इसका फ़ायदा अंग्रेज़ी माध्यम के प्रतियोगियों को ही मिलेगा।

अब सवाल यह उठता है कि आंदोलनकारियों का मनोबल गिराने के लिए सरकार ने ऐसा कदम क्यों उठाया जिससे आंदोलनकारियों में यह संदेश गया कि सरकार उनकी माँगों का मज़ाक उड़ा रही है। इसका जवाब यह है कि सरकार जिस शोषक वर्ग के हित साधने का साधन बनकर रह गई है वह अंग्रेज़ी के बहाने दशकों से देश के संसाधनों पर अपने एकाधिकार पर किसी तरह की दावेदारी को बर्दाश्त नहीं कर सकता है। यहीं आकर हमें इस आंदोलन के हिंसक दमन का कारण समझ में आता है। शोषक वर्ग को अपने एकाधिकार पर उठने वाली उँगली को मरोड़ने की आदत पड़ चुकी है और उसे इस बात से अब कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि वह जिन लोगों का दमन कर रहा है वह मीडिया की सीधी पहुँच से दूर रहने वाले आदिवासी हैं या दिल्ली में रहकर सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी करने वाले ऐसे लोग जिन तक मीडिया की आसान पहुँच है। ऐसे समय में प्रगतिशील बुद्धिजीवियों का संगठित होना ज़रूरी है। उन्हें केवल इस आधार पर आंदोलन से दूर रहने का नैतिक कारण नहीं मिल जाता कि अधिकतर आंदोलनकारियों में इस मुद्दे को लोकतंत्र के बड़े मूल्यों से जोड़ने की दृष्टि नहीं है। उन्हें इस आंदोलन को सही नज़रिये से देखने की सलाह देने की ज़िम्मेदारी किस वर्ग की है? क्या यह काम सरकार की तमाम ग़लत नीतियों का समर्थन करने वाला मीडिया करेगा?

सीसैट में अनुवाद की ग़लतियों को सुधारने के लिए सरकार के पास लगभग डेढ़ महीने का समय था। जिन गड़बड़ियों की चर्चा टेलीविज़न चैनलों के स्टूडियो से लेकर संसद में हो रही हो, उन्हें इस साल की परीक्षा में भी नहीं सुधारना असल में एक ऐसी लापरवाही है जिसके लिए संघ लोक सेवा आयोग के अधिकारियों को भी जनता की अदालत के कठघरे में खड़ा करना चाहिए। मीडिया में अनुवाद की ग़लतियों पर तो अच्छी-ख़ासी चर्चा हुई लेकिन भाषा से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहुत कम लोगों का ध्यान गया। सिविल सेवा परीक्षा में अंग्रेज़ी प्रश्‍नों के हिंदी अनुवाद में a, b, c, d आदि को हिंदी में न लिखकर अंग्रेज़ी में भी जस का तस छोड़ दिया जाता है। यह एक तरह से हिंदी वर्णमाला के अस्तित्‍व से इनकार करने के समान है। सालों से ऐसा इस तथ्य के बावजूद किया जा रहा है कि केंद्रीय हिंदी निदेशालय ने 1980 में ही a, b, c, d आदि को हिंदी में क, ख, ग, घ आदि लिखने का नियम बना लिया था। ऐसा इसलिए किया गया था कि हिंदी अनुवाद में कुछ लोग क, ख, ग, घ लिखते हैं तो कुछ अ, आ, इ, ई या अ, ब, स, द। इस नियम की अनदेखी करके हिंदी अनुवाद में भी अंग्रेज़ी वर्णों का प्रयोग भारतीय शासन तंत्र में हिंदी के सूक्ष्म अपमान का उदाहरण है।

सीसैट में ग़ैर-मानविकी विषयों के विद्यार्थियों को अनुचित फ़ायदा मिलने की बात को भी सरकार ने हवा में उड़ाने की कोशिश की। सच तो यही है कि गणित, तर्कशक्‍ति आदि के सवालों का बेहतर ढंग से जवाब देने के लिए सालों महँगे कोचिंग संस्थानों में तैयारी करने वाले परीक्षार्थियों की तुलना में मानविकी के विद्यार्थियों को बहुत अधिक मेहनत करनी पड़ती है। वहीं दूसरी ओर, ग़ैर-मानविकी विषयों के विद्यार्थी सामान्य अध्ययन के पेपर में बहुत कम अंक लाकर भी सीसैट के दूसरे पेपर की मदद से आसानी से मुख्य परीक्षा तक पहुँच जाते हैं। मानविकी से तमाम सरकारों को समस्या होती है। इसके विद्यार्थी सरकार से मुश्किल सवाल करने लगते हैं। जनतांत्रिक मूल्यों के प्रचार-प्रसार में मानविकी से मिलने वाली समझ और विश्‍लेषण क्षमता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। लेकिन 2011 के बाद सिविल सेवा परीक्षा में जिस तरह परीक्षार्थियों के सामाजिक ज्ञान की तुलना में प्रबंधकीय योग्यता को बहुत अधिक महत्व दिया जा रहा है उसे देखते हुए ज्ञान की इस शाखा के हाशिये पर जाने की आशंका भी बढ़ रही है। उच्च शिक्षा में मानविकी की लगातार अनदेखी होती आई है। भारत में सिविल सेवा परीक्षा के बहाने मानविकी को महत्व मिलता रहा है। लेकिन अब सीसैट के कारण इसका महत्व और भी कम हो जाएगा। सरकार को अपनी जनविरोधी नीतियाँ लागू करने के लिए कुशल प्रबंधक चाहिए न कि उसकी मंशा पर सवाल करने वाले लोग। यही वजह है कि बड़ी कंपनियों के दबाव में बनने वाली शिक्षा नीतियों में मानविकी को हाशिये पर डालने की कोशिश की जा रही है।

नौकरशाहों का एक वर्ग सीसैट का पक्ष लेते हुए यह तर्क देता है कि इससे उन परीक्षार्थियों को सिविल सेवा से दूर रखने में मदद मिलती है जो अपनी सत्तावादी और सांप्रदायिक सोच के कारण लोकतंत्र के लिए ख़तरा बन सकते हैं। अगर हम यह मान लें कि तर्कशक्‍ति के मूल्यांकन का इस संदर्भ में महत्व हो सकता है तो भी इन सवालों का आवश्यकता से अधिक संख्या में होने और परीक्षा के अंग्रेज़ी और अबूझ सरकारी हिंदी में होने का सवाल अपनी जगह बना रहेगा। क्या विवेक की भी कोई भाषा होती है? भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में समाज के सभी तबकों को शासन व्यवस्था में शामिल करने के लिए चुने गए प्रतियोगियों को प्रशिक्षण की अवधि के दौरान अंग्रेज़ी में दक्ष बनाया जा सकता है। आठवीं अनुसूची में शामिल सभी भारतीय भाषाओं में परीक्षा आयोजित करना भी असंभव नहीं है। क्या मानविकी के विद्यार्थियों पर गणित और तर्कशक्‍ति के बहुत-से सवालों का अनावश्यक बोझ डालकर उन्हें परीक्षा की दौड़ में पीछे रहने पर मजबूर करना सही है? क्या स्थानीय समस्याओं को ठीक से समझने के लिए इतिहास, भूगोल, संस्कृति आदि की औसत से बेहतर जानकारी से ज़्यादा महत्वपूर्ण वह गणितीय या तर्कशक्‍ति योग्यता है जिसका मूल्यांकन करने का दावा सीसैट के पक्षधर कर रहे हैं? जिस देश में असमान शिक्षा व्यवस्था हो, वहाँ उच्च वर्ग को प्रबंधन या इंजीनियरिंग की महँगी शिक्षा से मिलने वाली सुविधा को ध्यान में रखकर बनाई गई अलोकतांत्रिक परीक्षा पद्धति पर सवाल उठाना हर ज़िम्मेदार नागरिक का कर्तव्य है। इस सुविधा का अंदाज़ा आप इस तथ्य से लगा सकते हैं कि जहाँ 2010 में मुख्य परीक्षा तक पहुँचने वाले 47.5% प्रतियोगी मानविकी के विद्यार्थी थे वहीं सीसैट लागू होने के बाद 2011 में इनका प्रतिशत घटकर 31.2% रह गया।

इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता है कि भारत में अंग्रेज़ी केवल आर्थिक उन्नति से जुड़ी भाषा नहीं बल्कि औपनिवेशिकता से भी जुड़ी भाषा भी रही है। इसे सीखने पर किसी को आपत्ति नहीं है, लेकिन इसके आधार पर समाज के कमज़ोर तबकों को शासन व्यवस्था से दूर रखने की साज़िश का विरोध करना हमारा कर्तव्य है। सीसैट के विरोध के दौरान अनुवाद की जिन ग़लतियों पर मीडिया में चर्चा हुई वे शासक वर्ग के भाषाई षड्यंत्र के उदाहरण हैं। हिंदी को अनुवाद की भाषा बनाकर उसे न केवल आम लोगों बल्कि हिंदी भाषा के विद्यार्थियों के लिए भी अनुपयोगी बना दिया गया है। यह हिंदी हाशिये पर रहने वाले तबकों को आगे बढ़ने का अवसर देने में नाकाम रहती है। इसे ऐसा बनाकर शासक वर्ग हिंदी को कामकाजी तबके के लिए अनुपयोगी साबित कर देता है। हमें सभी भारतीय भाषाओं को ज्ञान की भाषा बनाने का संकल्प लेना चाहिए। ऐसा करना असंभव नहीं है। भारतीय भाषाओं को साहित्य तक सीमित रखने का नुकसान भारतीय लोकतंत्र को उठाना पड़ा है। अंग्रेज़ी को भाषा न मानकर ज्ञान मान लिया गया है। इससे अंग्रेज़ी में कही गई अधकचरी बात भी भारतीय भाषा में व्यक्‍त की गई सार्थक बात से कमतर साबित हो जाती है।

हमें यह समझना होगा कि भारत में अभी राजनीति जिस दिशा में आगे बढ़ रही है उसमें सरकारी तंत्र बार-बार शासन से ज़्यादा प्रबंधन को महत्व देने की बात कह रहा है। ज्ञान की सभी शाखाओं को प्रबंधन की योग्यता से कमतर आँकने की मानसिकता का विरोध करने के लिए अकादमिक जगत को भी आगे आना चाहिए। तमाम असुविधाओं का सामना करके सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे आंदोलनकारियों को शिक्षकों, लेखकों, आलोचकों आदि का सहयोग मिलना ही चाहिए। यह देखकर अफ़सोस होता है कि प्रगतिशीलता के अनेक नामवरों ने इस मसले पर चुप्पी साधी रखी। लोकतांत्रिक मूल्यों की लड़ाई केवल कहानी, कविता आदि में नहीं लड़ी जा सकती है। इसके लिए सड़क पर पुलिस की लाठियों का सामना कर रहे लोगों के समर्थन में आगे आना पड़ता है। सीसैट में भाषाओं का मसला उन भाषाओं को बोलने वाले तबकों के लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व का मसला है।

मेरा यह आलेख सामयिक वार्ता पत्रिका के सितंबर अंक में छपा है। 

बुधवार, 10 सितंबर 2014

अनुवाद में दम तोड़ती भारतीय भाषाएँ

सिविल सेवा परीक्षा में 2011 से लागू हुए सीसैट के विरोध में इस साल जो आंदोलन उठ खड़ा हुआ है उसके कारण लंबे समय के बाद हमारे लोकतंत्र में भारतीय भाषाओं की अनदेखी पर बहस का माहौल बना है। हालाँकि जिस देश में पिछले 50 साल में 250 भाषाएँ लुप्त हो गई हैं वहाँ आज़ादी मिलने के दशकों बाद इस मुद्दे पर लोगों का ध्यान जाना कम आश्‍चर्यजनक नहीं है। भाषाओं की अनदेखी का अर्थ है उस भाषा को बोलने वाले लोगों की अनदेखी और यही वजह है कि लोकतंत्र में विविधता को बचाए रखने का एक बहुत बड़ा साधन उन भाषाओं को समृद्ध करना है जो पूँजी की तानाशाही के इस दौर में हाशिये पर जा रही हैं। लोकतंत्र की विफलता का इससे बड़ा प्रमाण नहीं मिल सकता कि हमारे देश में अपने विषय के जानकारों को भी ज़िंदगी की दौड़ में उन लोगों से पीछे रहना पड़ता है जो अपनी वर्गीय स्थिति के कारण अंग्रेज़ी अच्छी तरह जानते हैं। इसके कुछ अपवाद ज़रूर हैं, लेकिन इन अपवादों से अंग्रेज़ी के वर्चस्व की पुष्टि ही होती है।

भारत में अंग्रेज़ी का अपना एक वर्गीय आधार है। अंग्रेज़ी मीडिया ने सुनियोजित तरीके से इस आंदोलन को ऐसे रट्टुओं का आंदोलन बताया जो अंग्रेज़ी का विरोध करने के बहाने कम मेहनत करके देश की प्रतिष्ठित परीक्षा में अव्वल आने का सपना देखते हैं। आंदोलनकारियों के ज्ञापन को पढ़े बिना इसे केवल हिंदी पट्टी के परीक्षार्थियों का ऐसा आंदोलन बताया गया जो केवल दिल्ली तक सीमित है। सच तो यह है कि जयपुर, पटना, इलाहाबाद, चेन्नई, हैदराबाद आदि शहरों में सीसैट के विरोध में रैलियाँ निकाली गईं। दिल्ली में आंदोलनकारियों ने अपने ज्ञापन में तमाम भारतीय भाषाओं के परीक्षार्थियों की घटती सफलता दर के आँकड़े पेश किए। अंग्रेज़ी मीडिया ने इस मामले को अनुवाद की समस्या तक सीमित करने की भी कोशिश की, जबकि असली समस्या यह है कि भारतीय भाषाओं को शिक्षा व्यवस्था में अनुवाद की भाषा का दर्जा दे दिया गया है।

उच्च शिक्षा में किसी भाषा को अनुवाद पर निर्भर बना देने से उसका विकास रुक जाता है। अनुवाद को ज्ञान प्राप्त करने के कई साधनों में से एक साधन मानने के बदले उसे एकमात्र साधन मानने की मानसिकता ने तमाम भारतीय भाषाओं का नुकसान किया है। हिंदी में यह नुकसान पत्रकारिता, विज्ञापन आदि की बनावटी भाषा में भी दिखता है। इतिहास, समाजशास्त्र, मनोविज्ञान आदि की हिंदी किताबों में अनुवाद को खाने में चटनी की तरह इस्तेमाल करने के बजाय भोजन ही बना दिया जाता है। इसे हिंदी माध्यम के परीक्षार्थियों के बौद्धिक हाज़मे के बिगड़ने की एक वजह माना जा सकता है। हिंदी के आलेखों में अंग्रेज़ी के शब्दों को रोमन लिपि में लिखने की प्रवृत्ति अंग्रेज़ी के सामने हिंदी के घुटने टेकने का उदाहरण है। भाषाई विविधता को ख़त्म करके अंग्रेज़ी के वर्चस्व वाली ऐसी दुनिया बनाने की कोशिश की जा रही है जिसमें पूँजी के तर्कों को काटने लायक न तो कोई विचारधारा बचे न भाषा।

हमारे देश में अंग्रेज़ी का एक ऐसा तंत्र विकसित किया गया है जिसके कारण सरकारी विभागों और भारतीय शिक्षा व्यवस्था में हिंदी अनुवाद की भाषा बनकर रह गई है। इसकी शुरुआत उसी समय हो गई थी जब संविधान के केवल अंग्रेज़ी संस्करण को मानक घोषित किया गया। इस ग़लती को सुधारने के बजाय हिंदी के ऐसे रूप को जनता पर लादने का काम जारी रखा गया जिसमें न तो भाषा की रचनात्मकता है न विचार का सौंदर्य। क्या करोड़ों लोगों की भाषा होने के बावजूद हिंदी को ज्ञान की भाषा मानने से इनकार करने के पीछे कोई बड़ा षड्यंत्र नहीं है? इस षड्यंत्र को समझने के लिए सीसैट का विरोध कर रहे आंदोलनकारियों की उस माँग को मानने से इनकार करने की वजह पर बात करनी होगी जिसमें सवालों का अनुवाद किए जाने के बजाय उसे हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में तैयार करने की बात कही गई है। जिस देश में सरकार द्वारा आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा सकते हैं, वहाँ इतनी छोटी माँग को मानने से इनकार करते हुए संसाधनों की कमी की बात कहना हास्यास्पद ही है। संघ लोक सेवा आयोग में वर्षों तक स्तरहीन अनुवाद को सुधारने की कोई कोशिश नहीं की गई। यह एक ऐसी लापरवाही है जिसके कारण न जाने कितने परीक्षार्थियों को सिविल सेवा परीक्षा में असफलता का सामना करना पड़ा। अगर किसी सवाल में 'लैंड रिफ़ॉर्म्स' के अनुवाद में 'लैंड' का अनुवाद ही न किया जाए तो इससे हिंदी के परीक्षार्थी की असफलता लगभग तय हो जाती है। सीसैट का विरोध कर रहे आंदोलनकारियों ने अपने ज्ञापन में ऐसे कई उदाहरण पेश किए हैं। अगर हमारे देश में सरकारी जवाबदेही नाम की कोई चीज़ होती तो योग्यता का ढोल पीटने वाले अधिकारियों को इस लापरवाही के कारण अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ता।

सरकारी तंत्र में जिस हिंदी का प्रयोग होता है उसे देवनागरी लिपि में लिखे ऐसे शब्दों का समूह कहना ग़लत नहीं होगा जिनका अर्थ न लिखने वाले व्यक्‍ति को पता होता है न पढ़ने वाले को। बाज़ार की हिंदी केवल सामान बेचने की भाषा के रूप में अपना अस्तित्व बचा पाई है। यह हिंदी अपनी जड़ों से कटी होने के कारण बेजान-सी दिखती है। मंत्रालयों में भी हिंदी की दुर्गति हो रही है। इसका एक उदाहरण देखिए:

"रक्षा के लिए और सामान्य में श्रमिकों के हितों और जो गरीब का गठन, समाज के वंचितों और नुकसान वर्गों की रक्षा. विशेष रूप से, उच्च उत्पादन और उत्पादकता और के लिए एक स्वस्थ माहौल बनाने का काम करने के कारण संबंध में मंत्रालय की मुख्य जिम्मेदारी है विकास और व्यावसायिक कौशल प्रशिक्षण और रोजगार सेवाओं के समन्वय." (श्रम एवं रोजगार मंत्रालय की वेबसाइट से)

मंत्रालयों की वेबसाइटों पर ऐसी हिंदी के प्रयोग पर मीडिया में भी कोई बहस नहीं होती। हिंदी की रोटी खाने वाले लोगों को भी अपनी भाषा के ऐसे अपमान पर ग़ुस्सा नहीं आता। इसकी वजह यह है कि भारतीय मध्यम वर्ग ने अपनी भाषाओं की चिंता करना छोड़ दिया है। आज़ादी के बाद भी देश की राजनीति में भारतीय भाषाओं को ज्ञान की भाषा का दर्जा दिलाने की कोशिशों को कभी सफलता नहीं मिली। जहाँ तक राजभाषा हिंदी की बात है तो उसे राजभाषा बनने के बावजूद बोली से भी कमतर दर्जा हासिल है। आप बोलियों को समझ सकते हैं, लेकिन राजभाषा हिंदी को समझना कभी-कभार नामुमकिन हो जाता है।

ऐसा नहीं है कि मंत्रालयों की वेबसाइटों में ही अबूझ हिंदी का प्रयोग होता है। सरकारी प्रकाशन में भी हिंदी के साथ वही व्यवहार किया जाता है जैसा ट्रेन की प्रथम श्रेणी बोगी में ग़लती से घुस आए ग़रीबों के साथ होता है। भारत सरकार के प्रकाशन विभाग की किताब 'भारत 2013' की भाषा देखिए:

"विकसित देशों द्वारा कमजोर न्यूनीकरण प्रतिबद्धताओं को सुददृढ़ बनाने, जलवायु परिवर्तन के नाम से एक पक्षीय व्यापार कार्यों को रोकन, जलवायु स्थिरीकरण के दीर्घावधि लक्ष्य के प्रति बढ़ने के उठाने में बराबरी अधिकार सुनिश्‍चित करने, बहुपक्षीय चैनलों के माध्यम से जलवायु परिवर्तन संबंधी वित्त पोषित करने के लिए पर्याप्त संसाधनों का प्रावधान और उन्हें जुटाने और प्रौद्योगिकी विकास और हस्तान्तरण प्रयासों के भाग के रूप में बौद्धिक सम्पदा अधिकारों पर वार्ता को निरंतर बनाए रखने के संबंध में अभी व्यापक कार्य किया जाना शेष है।"

क्या ऐसी हिंदी से प्रतियोगियों को परीक्षा की तैयारी करने में मदद मिल सकती है? क्या यह भारत सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है कि वह सरकारी प्रकाशन में ऐसे स्तरहीन अनुवाद की जाँच के लिए विभागीय कार्रवाई का आदेश दे? सरकार इनमें से किसी सवाल का जवाब नहीं देना चाहती है, लेकिन क्या एक प्रबुद्ध नागरिक के रूप में आपकी इस मामले में कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती है? मेरा यह सवाल ऐसे हर नागरिक से है जिसकी रोज़ी-रोटी हिंदी से ही चलती है।

सीसैट के विरोध में जो आंदोलन उठ खड़ा हुआ है उसे तमाम भारतीय भाषाओं में अच्छी किताबों को उपलब्ध कराने, सरकारी नौकरी की परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं की जगह बनाने और उच्च शिक्षा में भारतीय भाषाओं को शामिल करने के मुद्दों तक ले जाना होगा। अगर ऐसा नहीं होगा तो उन लोगों की बात सही साबित हो जाएगी जो इस आंदोलन को तलवार से काँटा निकालने की कोशिश बता रहे हैं। सीसैट विरोधी आंदोलन ने सिविल सेवा परीक्षा में भारतीय भाषाओं को शामिल करने के सवाल को ज़िंदा रखा है, लेकिन इस आंदोलन को समाज की दिशा बदलने की प्रक्रिया शुरू करने वाला आंदोलन तभी कहा जा सकेगा जब यह भाषा से जुड़े अन्य मुद्दों पर बहुत-से लोगों को सक्रिय करने में सफल साबित होगा। ऐसा तभी होगा जब हम भाषा के मुद्दे को नौकरी या आर्थिक लाभ के सीमित संदर्भ में न देखकर लोकतंत्र के मूल्यों से जोड़कर देखना शुरू करेंगे।

यह आलेख 'सबलोग' पत्रिका के सितंबर, 2014 अंक में प्रकाशित हुआ है।

सोमवार, 18 अगस्त 2014

Living with many tongues (फ़्रंटलाइन से साभार)

The presence of multiple languages in India has several implications for the idea of Indian and comparative literature, the formation of cultural institutions and for our democracy itself.


WALTER BENJAMIN had conceived the act of translation as one way in which human beings strive to retrieve their long-lost common tongue. The idea of an age when all human beings spoke in a single language seems common to many mythologies across the world though the stories about the loss of that tongue and the origin of linguistic diversity differ from tribe to tribe.
The most well-known of them is perhaps the biblical tale of the Tower of Babel, the ambitious city rising to the sky that the people from the east start building in Shinar, of which the gods become jealous and confound the language of the builders so that communication among them breaks down and they are driven to different parts of the world. In several cultures, the multiplicity of languages is associated with the deluge as in the Aztec legend where Coxcox and Xochiquetzal survive the deluge and beget many children who are bereft of speech: a dove endows them with language, but each is given a different speech so that they cannot talk to each other. The Kaska people of North America, too, believe that it was the deluge that scattered the people of the world, creating many cultures and languages. In a Salishan myth, two men enter into an argument on whether the high-pitched humming noise that accompanies the flight of ducks comes from their flapping of wings or from air passing through their beaks. The tribal chief could not settle the argument, so he summoned a council that had also representatives from neighbouring villages. The dispute divided the people into groups who moved away from one another and began speaking in different tongues.
In the Yuki story from California, it is the creator himself who lays sticks in houses to nominate people to diverse communities and prescribes different languages and customs for them. There is also a similar Iroqois story where the Holder of Heavens, Taryenyawagon, guides people on a journey and helps them settle down in different places where they develop different languages. The Ticunas believe people spoke a single language until they ate the eggs of a hummingbird. The Greeks, too, think under Zeus all spoke the same tongue, and it was Hermes who brought diversity of speech, leading to Zeus’ resignation and paving the way for Phoroneus, the first human king of the country. For the Bantus of East Africa, it was a famine that drove people mad, and they began to jabber strange words, leading to various languages. Only Eshu and the Yoruba can speak all languages. According to a South Australian myth, Wurruri walked with a stick scattering the fire in every hearth around which people were asleep. When Wurruri died, people were so happy that they sent the message in different directions inviting everyone to partake of her flesh. They ate different parts of the body and began speaking different languages. The Guniwinggu people of Australia believe that a goddess in dream-time gave each of her children a different language to play with. God Puluga of the Andamans first created a single language, bojig-yab, and gave it to the first human couple. But they had numerous offspring who were given different dialects and sent to distant lands.
We do not know whether we got so many languages from Scylla howling in many tongues or from the seven-tongued Agni, but we have comfortably lived with them and found this diversity extremely productive in cultural terms. True, we never cared to name this coexistence of many languages, and our languages did not originally have an equivalent of terms like “multilingualism” or “heteroglossia”: only recently, we have coined equivalents like “bahubhasheey”. Since we did not have the concept, we also did not have an antonym like “monolingual”, the idea of a monolingual (also mono-religious and monocultural) society having come from the West. For the colonialists, we were the “other” and they needed othering concepts to define us as a people like calling the people they found in India “Hindoos” and India, “Hindoostan”. It was this “Hindoostan” that was “multilingual”. Later, the concept was lent currency by linguists, ethnographers, demographers, and Orientalist scholars. For the people of India, the existence of many languages was but an extension of nature’s diversity and they easily moved from one language to another when they moved from place to place or received people from another place, thus adding Persian, Arabic and English, too, to their repertoire in the course of time, not to speak of the liberal borrowings and adaptations of words from French, Dutch, Portuguese, etc., to enrich their own languages. Travel and the study of many languages were even deemed essential for poets. Look at this passage from Kavikantabharanam by Kshemendra, the 12th century Sanskrit literary theorist for proof: “A poet should learn with his eyes the forms of leaves; he should know how to make people laugh when they are together; he should get to see what they are really like; he should know about oceans and mountains in themselves and the sun and the moon and the stars; his mind should enter into the seasons; he should go among many people in many places and learn their languages” (Verses 10-11, translated by A.K. Ramanujan).
Multilingual self-fashioning may be said to have been fundamental to South Asia’s cultural ecology, so much so that with the current understanding of language and dialect we find it hard to place poets like Amir Khusrau, Vidyapati, Namdeo, Kabir, Nanak, Meera, Chaitanya and Mirza Ghalib in any one of the modern languages. Even the writers who are supposed to have written in “Sanskrit” employed, besides Sanskrit, Prakrit, Magadhi, Paisachi, Shaurseni and Apabhramsha; and even the Tamil bhaktas, the Alwars and the Nayanmars, did not compose in what can be considered a homogenous Tamil.
Ramachandra Guha rightly argues that bilingualism really flowered during the 1920s when under Gandhi’s leadership the nationalist movement captured the imagination of the entire Indian people. Leaders and thinkers like Gandhi, Ambedkar and Tagore were effectively and effortlessly bilingual as were many writers and intellectuals of the period. Even in our time, we find a lot of writers writing in a language other than their mother tongue: they include some well-known names like U.R. Ananthamurthy, whose mother-tongue is Tulu; Girish Karnad, whose mother tongue is Konkani; and N.S. Bendre, whose mother tongue is Marathi, all the three writing in Kannada. This is true of all Indian English writers and several Urdu writers whose mother tongue could be anything from Hindi and Gujarati to Punjabi and Telugu. There are, too, writers who write in more than one language, one of which may be the mother tongue and the other English in many cases (Kiran Nagarkar, Jayanta Mahapatra, Arun Kolatkar, Dilip Chitre, A.K. Ramanujan and Kamala Das).The transactions between the local and the pan-Indian enhanced the creative potential of both the regional and the national—margi and deshi—giving rise to a literary culture that was marked by what today would be termed dialogism and heteroglossia.
Sheldon Pollock has suggested how multilinguality was seen by Europe as rising from an original sin and an evil that needs to be eradicated. The European conquerors sought to suppress the languages of the people they ruled over, leading to the complete or partial destruction of native tongues in many parts of the world. But, “In South Asia, although forms of will-to-power in the realm of language, and even narratives of language decay, are certainly to be found, no one ever mythologised the need to purify—let alone actually sought to purify—original sins of diversity through a programme of eradication. Diversity was not a sign of divine wrath, nor was multilinguality a crime that demanded punishment” (Sheldon Pollock, The Language of the Gods in the World of Men: Sanskrit, Culture and Power in Pre-modern India, 2006, page 477). As a result, even when ruled by those who spoke Persian or English, we continued to preserve our languages, and the rulers too, despite spreading their languages through education, did not care to incapacitate, banish or ruin Indian languages. Part of the credit for this, of course, goes to the Indian people who were committed to their mother tongues even while learning other languages. Strangely, though often for understandable reasons, it is after the British left that English is getting more and more popular as the medium of education and threatening Indian languages, forcing Ananthamurthy to remark that now our languages will be preserved by the poor and the villagers who have no means of educating their young in the English medium.
Homogenising tendency
Colonial modernity with its homogenising tendency has penetrated into our private and public worlds, seeking to level the inherent plurality of our cultural and linguistic worlds; more recently, globalisation has furthered this cause. But the modern revolution in information technology can help strengthen/revive Indian languages, provided we have the will. In Europe, there has also been the explicit linkage between “power and language as ethnically defined”, while in India there has hardly been any attempt to enforce purity of language using civil or political institutional structures. We have nothing like the French Akademi that continually checks the influx of words from other languages into French, and when we had movements like the one there was in Kerala for a “pure” Malayalam (pacha-Malayalam), they have been marginal and rejected in no time by the larger community of readers and writers. Linguistic hybridity, as much as racial hybridity, has been second nature to us and we keep switching as well as mixing languages easily and naturally. We also never had any clear distinction between a “language” and a “dialect”’ which, along with the ambiguity in the definition of “mother tongue”, frequent disappearances of languages or their merger with larger ones, existence of scriptless languages and attempts by some “big” languages to “devour” or invisibilise “smaller” languages, naming them their “dialects” (this applies most to Hindi, but on a lesser scale to many others), has made all our linguistic surveys tentative. So we have vastly varied accounts of about 1,652 languages belonging to eight linguistic groups (1961 Census), 1,576 mother tongues (1991 Census) or 325 languages used for in-group communication (Anthropological Survey of India), just to take some random examples.
The formation of linguistic States has set in motion the process of consolidating regional identity anchored in the majority language of the region bound within a geographical territory and encouraged the elite to equate linguistic identity with the ethnic identity that generates a discourse of power, alienating and excluding large sections of people. The recently concluded People’s Linguistic Survey of India headed by Ganesh Devy, which finds 780 languages used in India with 66 scripts, has exposed the fallacy behind the formation of linguistic States by pointing out how in each of these States several languages coexist. For example, Arunachal Pradesh has 90 languages, Assam, 55; Gujarat, 48; Maharashtra, 39; and West Bengal, 38. We seldom speak of Betta Kurumba or Eravalla or Irula when we discuss the language scenario in Tamil Nadu or Adiya or Mannan or Kanikkaran when we discuss that in Kerala. Hegemonies are at work not merely at the level of the nation but at that of the regions too where several languages are subsumed by the language spoken by the majority.
The presence of multiple languages in India has several implications for the idea of Indian literature, our translation scenario, the idea of comparative literature, the idea of modernity, the nature of our linguistic creativity, the literary use of English and our cultural policy and the formation of cultural institutions and ultimately for our democracy itself. We need to develop a federal and inclusive concept of Indian literature that can accommodate diverse voices, including the so-called “minor” languages, “dialects” and tribal languages. We also need to develop an alternative genealogy of Indian literature that challenges the Orientalist canons, looks beyond colonial concepts, subverts the religious-revivalist motives, takes oral literature seriously and travels to the deepest springs of our people’s creativity in its various forms. In the area of comparative literature, we need to outgrow the outdated model of comparing Indian language literatures with European literatures and focus on comparisons among the Indian language literatures with accent on shared forms, trends and movements as well as those specific to each language and the way even the so-called “movements” find specific modes of expression according to the genius of each language and culture as well as the special ways in which the margi and the deshi traditions have interacted with one another and the Western impact has been received and appropriated: a work left incomplete by pioneers like Sisir Kumar Das.
Though all the languages and literatures are considered equal in principle, they also have real differences in their growth occasioned by factors like age, independence, promotion, avenues of education, research and exchange, evolution of sensibility and modernisation. Some languages get absorbed into others and some are marginalised by systems of governance and education even within the States; the arrival of English has further complicated the power relationship among the languages. We also need to look closely at the attempts to develop indigenous modernities, the deployment of local myths, archetypes and folklore in contemporary literatures and the rereadings and rewritings of epics and works deemed classics in each literature. The differences between monolingual and polylingual creativity also demand attention. Even the Indian use of English—in vocabulary, syntax, style, texture—is inflected by Indian languages in different ways.
The presence of many languages also makes translation a necessary and natural activity, almost a condition of the existence and development of these languages. Still, the project is beset with problems like unequal exchange, wrong priorities, genre-wise discrimination, lack of planning and promotion, inadequacy of initiatives and of funding, absence of proper training, the gradual decline in multiple language skills, and the failure of the institutions of higher learning to encourage their trainees to learn languages from other parts of the country. Cultural and educational policy plays a major role in preserving and promoting—or otherwise—of our languages and literatures. There is an urgent need to fight the standardisation and homogenisation reinforced by the process of globalisation and to consciously encourage multilingual skills, to retrieve local language traditions from amnesia, to challenge the attempted return of colonial imaginaries as well as various forms of epistemic violence that seeks to destroy people’s world views and indigenous knowledge systems and to overcome the depletion of people’s linguistic-civilisational repertoires.

लेखक : के. सच्चिदानंदन

फ़्रंटलाइन से साभार

बुधवार, 6 अगस्त 2014

सीसैट विवाद : मसला भाषा नहीं, लोकतंत्र का है

सिविल सेवा परीक्षा में 2011 से लागू हुए सीसैट के विरोध में जो आंदोलन मुखर्जी नगर में शुरू हुआ उसकी गूँज अब भारत के कई राज्यों में सुनाई दे रही है। भारत में लंबे समय के बाद भाषा के मुद्दे पर इतना बड़ा आंदोलन उठ खड़ा हुआ है। सीसैट में अंग्रेज़ी और घटिया हिंदी अनुवाद के सहारे एक बड़े तबके को शासन व्यवस्था से बाहर रखने की साज़िश रची गई है। यह वही तबका है जो अपनी भाषाओं की मदद से देश की समस्याओं को केवल अंग्रेज़ी के जानकारों की तुलना में बेहतर ढंग से समझ सकता है। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि अंग्रेज़ी के जानकारों को अनुचित फ़ायदा पहुँचाकर लोक और तंत्र के बीच की दूरी बढ़ाने वाले सीसैट को बहुत हड़बड़ी में लाया गया।

सबसे पहले सीसैट से जुड़े आंदोलन में भाषा के राजनीतिक संदर्भों पर नज़र डालते हैं। अंग्रेज़ी के समर्थकों ने इसे हिंदी बनाम अंग्रेज़ी संघर्ष का रूप देने की कोशिश की है। इस काम में उन्हें मीडिया के अंग्रेज़ीदाँ तबके का भी सहयोग मिला है। ऐसा इस तथ्य के बावजूद हो रहा है कि आंदोलनकारियों ने अपने ज्ञापन में तमिल, कन्नड़ जैसी भारतीय भाषाओं में घटती सफलता दर के आँकड़े भी पेश किए हैं। 2011 में तमिल माध्यम के केवल 14 उम्मीदवार सिविल सेवा परीक्षा में कामयाब हुए थे। कन्नड़ में तो यह आँकड़ा और खराब था। उस साल इस भाषा के केवल पाँच लोग सफल हो पाए थे। आंदोलनकारियों ने अपने ज्ञापन में इन तमाम तथ्यों को शामिल किया है। इस तथ्य पर ध्यान देना ज़रूरी है कि 2013 में जहाँ कुल 1,122 उम्मीदवारों में से हिंदी माध्यम के 26 उम्मीदवारों को सफलता मिली वहीं तमाम अन्य भारतीय भाषाओं में कुल मिलाकर केवल 27 उम्मीदवार चुने गए। यहाँ क्षेत्रीय विविधता की कमी साफ़ तौर पर दिखती है। असल में यह आंदोलन लोकतंत्र के मूल्यों को बचाए रखने के बड़े मकसद की तरफ़ बढ़ सकता है। ऐसा तभी होगा जब भाषा के मसले को जनतांत्रिक मूल्यों के बड़े संदर्भ में देखा जाएगा। सरकार चाहे कांग्रेस की हो या भाजपा की, भारतीय भाषाओं के मामले में दोनों का एक जैसा ढुलमुल रवैया रहता है। हमारे देश में एक मूर्ति पर 200 करोड़ रुपये जितनी बड़ी राशि खर्च की जा सकती है, लेकिन भारतीय भाषाओं की प्रगति के लिए शिक्षण, पुस्तकालय आदि पर होने वाले खर्च में कटौती करने की बात कही जाती है।

आंदोलनकारियों ने सीसैट में घटिया अनुवाद को ग़ैर-अंग्रेज़ी माध्यम के उम्मीदवारों की सफलता की राह में रोड़ा बताया है। यहाँ इस बात पर ध्यान देना ज़रूरी है कि यूपीएससी की निगवेकर समिति ने भी इस परीक्षा में अनुवाद को बेहतर बनाने का सुझाव दिया है। अनुवाद की ग़लतियों को देखकर बहुत-से लोगों ने इस बात की जाँच करने की माँग की है कि कहीं ये ग़लतियाँ जान-बूझकर तो नहीं की जाती हैं। अंग्रेज़ी में लिखे प्रश्‍न में ‘land reforms’ को हिंदी में ‘सुधार’ लिखना एक ऐसी ग़लती है जिससे उम्मीदवारों की सालों की मेहनत बर्बाद हो सकती है। मुख्य परीक्षा में भी अनुवाद इतना जटिल होता है कि अंग्रेज़ी में मूल पाठ पढ़े बिना उसका अर्थ समझना असंभव हो जाता है। 2012 में लोक प्रशासन के पहले प्रश्‍नपत्र में अनुवाद का एक उदाहरण देखिए - "राज्य उद्देश्य (स्टाट्सराइसन) के इस अमूर्त विचार के संतघोषण में अधिकारीतंत्र की अपनी स्वयं की शक्‍ति के परिरक्षण की दशाओं की निश्‍चित मूल-प्रवृत्तियाँ अभिन्न रूप से ग्रथित रहती हैं।" जहाँ एक-एक पल का महत्व हो, वहाँ इन लापरवाहियों से किस तबके को फ़ायदा होगा यह आप आसानी से समझ सकते हैं। इस मसले पर आवाज़ उठाते हुए आंदोलनकारियों को उस मानसिकता का भी विरोध करना होगा जिसमें केवल अंग्रेज़ी को भाषा और तमाम भारतीय भाषाओं को बोली का दर्ज़ा दिया जाता है।

हिंदी करोड़ों लोगों की भाषा होने के बावजूद न्याय व्यवस्था, प्रशासन आदि में अनुवाद की भाषा बनकर रह गई है। सरकारी हिंदी का अर्थ ही है अनूदित हिंदी। यह हिंदी जनता से बहुत दूर खड़ी नज़र आती है। इसके शब्द जनता के मुँह या कलम से निकले शब्द न होकर उन शब्दकोशों से निकले शब्द हैं जो अब अप्रासंगिक हो चुके हैं। जब देश में जनता के अधिकारों को छीनने की परंपरा विकसित हो जाती है तब उसे ऐसी भाषा की ज़रूरत पड़ती है जो बहुत बड़े तबके की समझ से बाहर हो। भारत में यह भूमिका अंग्रेज़ी और सरकारी हिंदी निभाती है। ‘सामान्य’ को ‘प्रसामान्य’ लिखकर इसे हिंदी उम्मीदवार के लिए अनावश्यक रूप से ‘असामान्य’ बना दिया जाता है। सरकारी विभागों में इस हिंदी को प्रचलित करने में उन अधिकारियों की बहुत बड़ी भूमिका है जो हिंदी को संस्कृत बनाने की ज़िद पाल बैठे हैं। उन्हें हिंदी में संस्कृत को छोड़कर अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों के प्रयोग से भी चिढ़ होती है। असल में वे कभी अंग्रेज़ी तो कभी संस्कृत के कठिन शब्दों से भरी हिंदी के बहाने विशिष्ट होने की उच्चवर्गीय मानसिकता से ग्रस्त हैं। इस हिंदी में ऐसे बेजान शब्दों का प्रयोग किया जाता है जो संग्रहालय में भूसे से भरे शेर-बाघ की तरह पाठकों को केवल डराने का काम करते हैं। अनुवाद की भी अपनी अलग राजनीति होती है। जो भाषा आर्थिक दृष्टि से संपन्न होती है, उसके व्याकरण, वाक्य संरचना, शब्दावली आदि का दबाव उस भाषा पर देखने को मिलता है जो सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से कमज़ोर होती है।

सिविल सेवा परीक्षा में अंग्रेज़ी के वर्चस्व और अनुवाद से जुड़ी समस्याओं को लेकर शुरू किया गया आंदोलन भारतीय भाषाओं को रोज़गार से जोड़ने के बड़े मकसद तक जा सकता है। ऐसा तभी होगा जब भारतीय भाषाओं में अच्छे शब्दकोश, विश्‍वकोश आदि उपलब्ध होंगे। इतिहास, समाजशास्त्र आदि विषयों में अच्छी किताबों की उपलब्धता भी ऐसे आंदोलन के लक्ष्यों में शामिल होनी चाहिए। शासक वर्ग ने बड़ी चालाकी से बुद्धिजीवियों में भी यह धारणा फैला दी है कि इन विषयों को भारतीय अंग्रेज़ी में ही पढ़ना चाहते हैं, जबकि सच तो यही है कि ऐसे लाखों उम्मीदवार हैं जो अच्छी किताबें नहीं उपलब्ध होने के कारण मजबूरी में अंग्रेज़ी माध्यम से परीक्षा देते हैं। सरकार से यह कहने का समय आ गया है कि करोड़ों रुपये खर्च करके मूर्ति बनवाना किताबें छपवाने से अधिक महत्वपूर्ण काम नहीं है। जब तक भाषा से जुड़े आंदोलनों में इन मुद्दों पर बात करके लंबे समय तक चलने वाले कार्यक्रम नहीं बनाए जाएँगे, तब तक सरकार के लिए किसी परीक्षा के संदर्भ में उठाए गए सवालों की अनदेखी करना आसान बना रहेगा।


सुयश सुप्रभ का यह आलेख आग़ाज़ पत्रिका के प्रवेशांक (अगस्त  2014 अंक) में प्रकाशित हुआ है।

मंगलवार, 1 जुलाई 2014

राह से भटकी बहस

भारत में भाषा के मसले पर उठने वाली बहसों में तथ्यों और सामाजिक वास्तविकताओं से मुँह मोड़कर केवल भावना को छूने वाली बातें दोहराई जाती हैं। हाल ही में नई सरकार के भाषा संबंधी फ़ैसलों की प्रशंसा-आलोचना के शोरगुल में तार्किक बातें नक्कारखाने में तूती बनकर रह गई हैं। अभी हमें यह समझने की ज़रूरत है कि राजभाषा हिंदी और जनता की हिंदी के विकास को एक नहीं माना जा सकता है।

राजभाषा विभाग ने 10 जून, 2014 को जारी किए गए सर्कुलर में जिन मुद्दों को प्राथमिकता सूची में रखा है उनका उस हिंदी से कोई संबंध नहीं है जो पत्रकारों, विद्यार्थियों, शोधार्थियों आदि की कलम से निकलती है। अगर सरकार हिंदी को ज्ञान और रोज़गार की भाषा बनाने के लिए कोई सार्थक पहल करती तो बात अलग थी। राजभाषा विभाग ने जिन मुद्दों पर ध्यान देने की बात कही है उनमें से केवल एक मुद्दा हिंदी की रोटी खाने वाले तबके के लिए प्रासंगिक हो सकता है, वह भी तब जब सरकार अपनी वर्तमान नीतियों में बदलाव लाए। यह मुद्दा है सरकारी वेबसाइटों को अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों भाषाओं में उपलब्ध कराने का। अगर सरकार यह काम लापरवाह अधिकारियों और स्तरहीन काम कराने वाली अनुवाद एजेंसियों की मदद लेकर पूरा करती है तो सरकार का यह काम भी आम जनता के लिए अप्रासंगिक साबित होगा।

सरकारी वेबसाइटों की हिंदी देखकर यह सवाल बार-बार मन में उठता है कि हिंदी के सार्वजनिक अपमान पर मीडिया और अकादमिक जगत दोनों ने लंबे समय से चुप्पी क्यों साध रखी है। राजभाषा विभाग की वेबसाइट की यह स्थिति है कि इसके मुख्य पृष्ठ पर 'अधीनस्थ' और 'अधिनस्थ' दोनों वर्तनियों का प्रयोग हुआ है, जबकि सही वर्तनी 'अधीनस्थ' है। यह विभाग जिस गृह मंत्रालय के अंतर्गत काम करता है उसकी वेबसाइट के मुख्य पृष्ठ पर 'महत्व' को 'महत्वज' लिखा गया है। वर्तनी की एकरूपता का यह हाल है कि एक जगह 'केंद्रीय' और दूसरी जगह 'केन्द्रीय' वर्तनी का प्रयोग हुआ है। वर्तनी की अशुद्धियों को देखकर ऐसा लगता है कि यह वेबसाइट हिंदी सीखने वाले विद्यार्थियों को वर्तनी की अशुद्धियाँ खोजने का अभ्यास कराने के लिए बनाई गई है। अगर आपको किसी वेबसाइट के एक ही पृष्ठ पर 'मुख्यो', 'मुख्यत', 'मुख्यन', 'विभिन्न्', 'व्येय', 'अधीनस्थर', 'व्ययवस्थाग, 'प्रस्तुयत' जैसी अशुद्धियाँ देखने को मिलें तो आप उस वेबसाइट के बारे में क्या सोचेंगे?

हमें इस बात की अनदेखी नहीं करनी चाहिए कि प्रधानमंत्री और नई सरकार के भाषा संबंधी कदमों के पक्ष-विपक्ष में दिए जाने वाले तमाम तर्कों में रोज़गार, भारतीय भाषाओं में मौलिक लेखन जैसी बातें सिरे से गायब हैं। न तो जयललिता तमिल में रोज़गार के नए अवसर पैदा करके हिंदी के तथाकथित वर्चस्व को चुनौती देती नज़र आती हैं न हिंदी के विकास की बात करने वाले सरकारी अधिकारी और नेता इसे रोज़गार की भाषा बनाने की कोई ठोस योजना सामने रख रहे हैं। अगर हमारे प्रधानमंत्री विदेश यात्रा के दौरान हिंदी में बात करते हैं तो इससे भारत में हिंदी की दयनीय स्थिति पर कोई खास असर नहीं पड़ता है। इस बात की तरफ़ बहुत कम लोगों का ध्यान जा रहा है कि हिंदी समेत तमाम भारतीय भाषाओं को सुनियोजित ढंग से भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षा में महत्वहीन बना दिया गया है। उच्च शिक्षा में सामाजिक विज्ञान, मनोविज्ञान जैसे विषयों में भी विद्यार्थियों पर अंग्रेज़ी थोपी जा रही है। विश्वविद्यालयों में हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों के साथ दोयम दर्ज़े के नागरिक जैसा व्यवहार किया जाता है। पत्रकारिता में भी हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के पत्रकारों को अंग्रेज़ी पत्रकारों की तुलना में बहुत कम वेतन मिलता है। इन मसलों पर ध्यान दिए बगैर केवल प्रतीकात्मक कदम उठाने की कोई सार्थकता नहीं है।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सरकारी विभागों में हिंदी के प्रयोग से संबंधित नियमों का कड़ाई से पालन कराने की बात से हिंदी की रोटी खाने वाले अधिकांश लोगों में अपनी भाषा को लेकर आत्महीनता की भावना पहले से कम हो गई है। हिंदी से जुड़े काम करने वाले लोगों को इस बात की उम्मीद हो रही है कि अब उनके बौद्धिक श्रम का महत्व समझा जाएगा। लेकिन तथ्यों की पड़ताल करने के बाद हमें पता चलता है कि इस उम्मीद की बुनियाद बहुत कमज़ोर है। राजभाषा हिंदी का दायरा इतना छोटा है कि उसमें हिंदी जगत की वास्तविक समस्याओं और आकांक्षाओं के लिए कोई जगह नहीं है। जब तक सरकार हिंदी की वास्तविक समस्याओं पर ध्यान नहीं देती, तब तक गलत उम्मीद पाले रखना ठीक नही होगा। हिंदी में न तो स्तरीय कोश हैं न संदर्भ ग्रंथ। सरकारी व अकादमिक प्रकाशनों में भी न तो वर्तनी की एकरूपता का ध्यान रखा जाता है न व्याकरण का। मीडिया में लिखित हिंदी को बोली का रूप देने की साज़िश रची जा रही है और इसका मुकाबला करने के लिए सरकार ने कोई रणनीति नहीं बनाई है। इस बात को झुठलाने की कोशिश की जा रही है कि समय के साथ बदलती भाषा में भी नियमों की प्रासंगिकता हमेशा बनी रहती है क्योंकि नियमों के बिना पत्रिका, किताब, शोध पत्र आदि में विचारों को सुव्यवस्थित ढंग से व्यक्त करना संभव ही नहीं होता। जिस दिन हिंदी में 'द शिकागो मैनुअल ऑफ़ स्टाइल' जैसी कोई किताब पत्रकारों के लिए अनिवार्य संदर्भ ग्रंथ का दर्ज़ा हासिल कर लेगी, उस दिन हिंदी के विकसित भाषा होने पर मुहर लग जाएगी। अभी हिंदी जिस भाषाई अराजकता का सामना कर रही है उसे देखते हुए इसे ज्ञान की भाषा बनाने की चुनौती सचमुच बहुत कठिन लगती है।

भाषा के मसले पर होने वाली तमाम बहसों में इस तथ्य की अनदेखी कर दी जाती है कि अनुवाद के क्षेत्र पर समुचित ध्यान देकर लाखों लोगों की रोज़ी-रोटी का इंतज़ाम किया जा सकता है। एक अनुमान के मुताबिक वर्ष 2018 तक अनुवाद का अंतरराष्ट्रीय बाज़ार लगभग 22 खरब रुपये का हो जाएगा। इतने बड़े बाज़ार पर सरकार ने अभी तक कितना ध्यान दिया है यह तो आपको सरकारी विभागों की कार्यशैली से पता चल गया होगा। अमेरिका में अनुवाद तेजी से उभरते पेशों की अग्रिम पंक्ति में जगह बना चुका है। स्वतंत्र अनुवादकों ने अनुवाद को ज्ञान की शाखा और पेशे के रूप में एक अलग पहचान दिलाई है। एशिया में भी अनुवाद के बाज़ार का विस्तार हो रहा है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सरकार को स्तरीय वेबसाइटों की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए एक ऐसा तंत्र विकसित करना चाहिए जिसमें अनुवादकों को अपर्याप्त पारिश्रमिक देने वाली अनुवाद एजेंसियों की कोई भूमिका नहीं रहे। स्वतंत्र अनुवादकों को सरकार के लिए सीधे काम करने का अवसर मिलना चाहिए। इसके लिए सरकारी विभागों में अनुवाद की न्यूनतम दर भी तय कर देनी चाहिए। हिंदी समेत तमाम भारतीय भाषाओं में अनुवाद को प्रोत्साहित करने की ज़रूरत है। भारतीय भाषाओं में नौकरी के लाखों अवसर पैदा किए जा सकते हैं। अगर सरकार यह ठान ले कि प्रशासन, न्यायपालिका आदि में अंग्रेज़ी के बदले स्थानीय भाषाओं में ही काम कराया जाएगा तो न जाने कितने बेरोज़गारों को काम मिल जाएगा।

अगर सरकार हिंदी और भारतीय भाषाओं के भविष्य के प्रति सचमुच चिंतित है तो उसे इन भाषाओं को रोज़गार से जोड़ने की कोशिश करनी चाहिए। शासक वर्ग अंग्रेज़ी को ही ज्ञान घोषित करने की कोशिश कर रहा है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि भाषा को ज्ञान या विचार की अभिव्यक्ति का साधन मानना ही सही है। इसे ज्ञान मानना गलत होगा, लेकिन शासक वर्ग को अपने हित साधते समय सही-गलत की परवाह नहीं रहती है। इस भेदभाव को खत्म किए बिना केवल भाषा के सम्मान की प्रतीकात्मक राजनीति से किसी को कुछ हासिल नहीं होगा।

रविवार, 15 जून 2014

In other words, in other tongues (डी.एन.ए. से साभार)

Translated copies of Indian novels continue to do very well in European countries, providing a lucrative channel of income for Indian authors, finds Gargi Gupta.

It is one of those apocryphal stories that the publishing world thrives on — a manuscript by an unknown author gets picked up by a discerning agent/publisher and becomes a bestseller, not just in the language it was written in but also in its translated version.

Marc Parent, the French publisher and Indophile who now runs India Maya Literary agency, was at the London Book Fair in 2006, when an agent gave him a manuscript to read. "I devoured it through the night," he remembers, "and went back the next morning and acquired the rights to it." Parent was then editorial director of foreign literature for French publishing house Buchet-Chastel and the manuscript was Aravind Adiga's The White Tiger.

By the time the French translation hit the shops in August 2008, Adiga's book had already been published by Atlantic to much acclaim. A month later in September, The White Tiger won the Man Booker Prize and Le Tigre Blanc became a bestseller, selling as many as 150,000 copies to date. Not bad, if you compare it with the upwards of 300,000 copies of The White Tiger sold in India.

But this was not Parent's biggest success. That goes to Tarun Tejpal's debut novel The Alchemy of Desire (2006), which has sold 300,000 copies in its many editions, won the Le Prix Mille Pages for Best Foreign Literary Fiction and was shortlisted for the Prix Femina.

More recently, the German translation of Pankaj Mishra's From the Ruins of Empire: The Intellectuals Who Remade Asia won the 2014 Leipzig Book Award for European understanding, the first non-Western book to get the prestigious Euro 15,000 award.

And it's not just in France and Germany that Indian authors are finding readers in tongues other than their own. They've also got a following in smaller countries such as Portugal, Italy, Finland, Norway, Sweden, Denmark, Estonia, Holland, and Greece.

Translation rights for The White Tiger were sold for 26 languages. Even Chandrahas Choudhury's Arzee the Dwarf was translated into German and Spanish. Polish publisher Wielka Litera is bringing out a translation of Arundhati Roy's Broken Republic early next month. Wielka Litera has also published Kishwar Desai's Witness the Night.

Friederike Barakat, part of the foreign rights team at German publishing house Hanser, says Indian authors like Vikram Seth, Amitav Ghosh and Jeet Thayil are well known in her country.

"The trend began with Roy's The God of Small Things, which was the first real bestseller by an Indian author," says Barakat, who was in New Delhi for the World Book Fair. Hanser has published the Mumbai-based poet Ranjit Hoskote and is coming out with a book on Gulaabi Gang founder Sampat Pal Devi.

But what is it about Indian novels that so appeal to European readers? Most of their narratives are specific to India, and refer to experiences that are unique to it. "The Germans don't necessarily want to read only about themselves. Cultural difference can be interesting too, or how would the Scandinavian detective novel become such a global rage," says Barakat.

"What played a part in The White Tiger's success was the French desire for the sweeping story of India," says Parent. "While India is a developing country and an emerging economic power, for most French people it is still associated with poverty."

Sometimes, a minor tweak can work wonders. Manil Suri's The Age of Shiva sold a creditable 18,000 copies in its French version, but its publishers, Albin Michel, changed its title to Mother India.

Of course, the West's fascination with India is not new. After all, the French were one of the major purveyors of Orientalism, and Indian and Eastern cultures had a major influence on Western philosophy, culture, arts, music, even fashion. Among Indian writers, Rabindranath Tagore is best known in Europe. Pioneers of Indian writing in English such as RK Narayanan have been widely translated, as have the first-wave of Indian writers in English who made it big on the international scene — Arundhati Roy, Salman Rushdie, Vikram Seth and Amitav Ghosh. What has changed now, says Parent, is the pace of the translations and how well they do commercially.

As a result, translation rights have emerged as a lucrative source of income for Indian authors. Parent negotiated the sale of the German translation rights for Saltwater, the debut novel by Mumbai-based Shrey, for a "five-figure Euro." Parent says it was a generous deal, but overseas rights can bring in as much as Rs10 lakh at current exchange rates. A tidy sum by any reckoning!

डी.एन.ए. से साभार

मंगलवार, 10 जून 2014

अनुवादक संघ की पहली ऑनलाइन बैठक


अनुवादक संघ की पहली ऑनलाइन बैठक 22 फ़रवरी, 2014 को फ़ेसबुक पर आयोजित की गई। आप इस बैठक में हुई चर्चा के महत्वपूर्ण अंश नीचे पढ़ सकते हैं :

ललित सती

ब्लॉग का सुझाव तो बहुत अच्छा है। नियमित लिखने में समस्या है। अभी कोई ज़िम्मेदारी लेने की बात चलेगी तो हो सकता है मैं कहूं कि अगले दो माह तक ज़बरदस्त व्यस्तता है। वाकई है भी। ऐसा अन्य स्वतंत्र अनुवादकों के साथ भी हो सकता है। मुझे यह लगता है कि अनुवादक समूह में बीच-बीच में जो चर्चाएँ चलती हैं उन्हें संपादित रूप में हम ब्लॉग पर डालते चलें। इस तरह की ग्रुप चैट को भी हम ब्लॉग पर डाल सकते हैं। इस तरह की ग्रुप चैट या अनुवादक समूह की चर्चाओं में हम व्यस्तता के बीच भी भाग ले लेते हैं और कई बार बड़े काम की बातें भी सामने आ जाती हैं। मुझे यह लगता है कि अनुवादक समूह में बीच-बीच में जो चर्चाएँ चलती हैं उन्हें संपादित रूप में हम ब्लॉग पर डालते चलें। इस तरह की ग्रुप चैट को भी हम ब्लॉग पर डाल सकते हैं। इस तरह की ग्रुप चैट या अनुवादक समूह की चर्चाओं में हम व्यस्तता के बीच भी भाग ले लेते हैं और कई बार बड़े काम की बातें भी सामने आ जाती हैं। अभी भी हिंदी में एक बड़ी समस्या है। अनुवाद की हैसियत टाइपिस्ट या नगरपालिका के बाबू से अधिक नहीं है। अनुवाद पर लेख लिखेंगे तो हिंदी विभाग के विभागाध्यक्ष लिखेंगे और उस शोधपत्र को पढ़ने के लिए मारीशस हो आएँगे।



एक तो यह बड़ी चीज़ है, जिसे प्रकाश जी ने इंगित किया और जिस पर सुयश व अन्य साथी भी विचार प्रकट करते रहे हैं कि महत्वपूर्ण स्थानों व विभागों में ही हिंदी ग़लत लिखी होती है। इसका वेबसाइट में या ब्लॉग में एक अलग स्थान हो सकता है। जो हिंदी की ऐसी-तैसी के उदाहरणों को एक जगह रखेगा। इसे मीडिया भी नोटिस करेगा।

यदि चर्चाओं को असंपादित रूप में भी ब्लॉग में डाल दिया जाए तो कोई दिक्कत नहीं है। यह एक अलग विधा के रूप में दिलचस्प हो सकती है पढ़ने में।

व्यक्तिगत तौर पर कहूँ तो महीने में एक पोस्ट लिखने के लिए समय निकालने की मेरी पूरी सदिच्छा है। समय की जहाँ तक बात है कई-कई दिन यूँ ही भी निकल जाते हैं। लेकिन एक स्वतंत्र अनुवादक के तौर पर काम करते हुए हमेशा चल रहे प्रोज़ेक्ट का बोझ दिमाग पर बना रहता है। यह एक आलसी व्यक्ति की समस्या हो सकती है, हो सकता अन्य मित्रों को अनुशासित हो पाने में समस्या न आती हो। जहाँ तक अनुवादक समूह में त्वरित टिप्पणी करने की बात है, उसमें मेरी दिलचस्पी रहती है।

अमृतराय या रांगेय राघव जैसे अनुवादकों की श्रेणी को छोड़ दिया जाए, तो कमर्शियल अनुवाद के क्षेत्र में लगे अनुवादक ही वे अनुवादक हैं जो नानाविध समस्याओं से जूझते हैं और नानाविध विषयों में सर खपाते हैं।

पढ़े-लिखे लोगों को भी नहीं पता होता है कि कमर्शियल अनुवाद की एक अलग ही दुनिया है, जिसका कार्य न तो किसी पुस्तक मेले में विमोचित होता है, न किसी किताब के सुनहरे अक्षरों में दर्ज होता है।

मीडिया में अपने मित्रों को पकड़ना पड़ेगा। स्टोरी तो कई अच्छी बन सकती हैं। यही कि हिंदी विभागों में ही हिंदी की कैसी दुर्गति है। राजभाषा के नाम पर कैसे लूट हो रही है इत्यादि। और ऐसा 14 सितंबर के आसपास किया जा सकता है।

वैसे यह सुझाव अच्छा था कि एक सर्वे किया जाए जिसमें यह पता किया जाए कि सरकारी विभागों में कितने ऐसे हैं जिनकी वेबसाइट हिंदी में है। और कुल कितने ऐसे विभागों की वेबसाइटें हैं जिनमें भीषण ग़लतियाँ नहीं हैं।

इसीलिए मैं तो स्वतंत्र अनुवादकों के श्रम के सही मूल्य को हासिल करने की दिशा में काम करने का प्रबल पक्षधर हूँ। यद्यपि अनुवादक संघ थोड़ी विस्तृत सोच रखता है।

कामगार अनुवादक, मेहनतकश लेखक एकजुट हों और फ़र्ज़ी हिंदी विद्वानों को सत्ता से बेदखल करें, अपनी तो यही कामना है।

सुयश सुप्रभ

शायद वेबसाइट से नियमित लेखन की समस्या दूर हो जाए।

प्रोफ़ेसरों और विद्वानों से भी लिखवाया जा सकता है।

वेबसाइट से अकादमिक जगत के लोगों से संपर्क करने में भी सुविधा होगी।

क्या हम महीने में एक पोस्ट के लिए समय नहीं निकाल सकते हैं? तात्कालिक लाभ नहीं हो तो हम सभी उत्साह नहीं जुटा पाते हैं। लेकिन लंबे समय में मिलने वाला फ़ायदा भी तो महत्वपूर्ण है। इससे पूरे समुदाय का फ़ायदा होता है।

हमने मानक सामने नहीं रखे हैं, इसलिए अनुवाद की गुणवत्ता को लेकर अनावश्यक विवाद भी खड़ा होता रहता है। विवाद तो हमेशा होगा।

बाबुओं को नींद से जगाने के लिए सूचना के अधिकार का भी प्रयोग किया जा सकता है।

अगर 10 अनुवादक भी महीने में एक पोस्ट लिखने की ज़िम्मेदारी ले लें तो कंटेंट की समस्या नहीं रहेगी।


एक सलाह यह भी है कि हम अंग्रेज़ी या किसी अन्य भाषा के ब्लॉग की पोस्ट का हिंदी अनुवाद करें। ब्लॉगों की सूची यहाँ देखें : अनुवाद से संबंधित 100 महत्वपूर्ण ब्लॉग

मीडिया में अनुवादकों की कमी नहीं है। बहुत-सी पत्रिकाओं में केवल अनुवाद का काम होता है। हमें वहाँ से भी अच्छे लोग मिल सकते हैं।

औपचारिक रूप वाले संगठनों की कमी नहीं है। अगर हम ठोस और सार्थक काम के कुछ उदाहरण सामने रखकर औपचारिक स्वरूप की तरफ़ बढ़ें तो अच्छा रहेगा। अभी सक्रिय सदस्यों की भी कमी है।

दो मोर्चे हैं। स्तरीय अनुवाद और भाषा के उदाहरण सामने रखना है और स्तरहीन अनुवाद को बाज़ार में चलाने की कोशिश का विरोध करना है।

हरिशंकर साही

भाषाई स्तर पर काम करते समय एक समस्या या यूं कहें कि एक प्रक्रिया रहती है शब्दों के चयन की. ऐसे में अनुवादक संघ के ब्लाग पर भी मैं गया हूँ, और ग्रुप या अन्य जगहों पर भी, लेकिन शब्दों के प्रचलन में होने या चलन से बाहर जाने पर एक लगातार हो रहे परिवर्तन पर कुछ खास नहीं मिल पाता है... ऐसे में इसे अगर आप लोग ब्लाग और वेबसाईट पर जोड़ें तो बेहतर रहेगा.


वैसे एक बात और कहना चाहूँगा कि अनुवाद कराने वाली देशी-विदेशी एजेंसियों के कार्य व्यवहार और भुगतान के आधार पर भी अनुभव साझा होने चाहिए, जिससे काम लेते समय कुछ जानकारी पहले से हो सके.

पढ़े-लिखे लोग खास तौर पर हिंदी पट्टी में लोग अनुवाद को बहुत आसानी से किए जा सकने वाले कार्य के रूप में मापते हैं. जबकि यह क्षेत्र कई सारी विधाओं को साथ लेकर चलता है.

बहुत से पत्रकार भी अनुवादक का काम करते हैं. लेकिन मुद्दों को जगह देने के लिए तो खुद ही पहल करनी पड़ेगी. अन्यथा खबर व्यवसायी अपनी जगह क्यों देने लगे.

सरकारी क्षेत्र में अनुवाद "अरे हो जाता है" प्रकार का काम होता है... लेकिन कंपनियां अपने जुगाड़ से अच्छा पैसा बना लेती हैं. सरकारी क्षेत्र को अनुवाद के प्रति सजग करना चाहिए.

मीडिया तब तक इस पर ध्यान नहीं देगा, जब तक उसे अनुवाद के क्षेत्र में खबरों के लिए पाठकों का दबाव नहीं पड़ेगा.



नरेंद्र तोमर

मुझे लगता है एक ज्‍यादा बडी समस्‍या यह है कि क्‍या और किन विषयों को लेकर लिखा जाए । अनुवाद कहीं शून्‍य में नहीं होता । बाजार, प्रकाशक, पाठक और भाषा और खास तौर पर हिंदी की वर्तमान स्थिति को सामने रखकर ही सार्थक बात हो सकती है।

एक विषय तो अनुवाद की भाषा ही है कि वो कैसी होनी चाहिए ? अखबारों वाली या साहित्यिक ? चारों ओर से अंग्रेजी की भारी घुसपैठ के बीच रह रहा आज का हिंदी पाठक किस भाषा को पसंद करता है ?

आनंद

हम सभी को माह में एक पोस्‍ट लिखने का वायदा अब पूरा करना ही पड़ेगा।

पहले सरकारी वेबसाइटों को देखें। विभिन्‍न मंत्रालयों से लेकर राज्‍य एवं जिला सरकार के विभिन्‍न विभागों की वेबसाइटों का सरसरी तौर पर सर्वे किया जाए।

99 प्रतिशत हिंदी में नहीं हैं। 90 प्रतिशत में शुरुआती पृष्ठ हिंदी में है, शेष अंग्रेजी में चल रही हैं। यह एक बहुत बड़ा बाजार है जिसका लाभ उठाया जा सकता है।

दो फ्रंट पर काम करना पड़ेगा, जैसे वाटर प्‍यूरीफायर वाले करते हैं। पहला , वे बताते हैं कि अब तक आप जो पानी पी रहे थे, कितना गंदा था, और दूसरा कि साफ पानी सप्‍लाई करने की मशीन हमारे पास है।


दोतरफा दबाव की रणनीति। शिकायत की एक प्रति संसदीय राजभाषा समिति को ईमेल या पंजीकृत डाक से भेजनी पड़ेगी, यदि फिर भी समाधान न हुआ तो इसे मीडिया में प्रचारित करने की धमकी देनी पड़गी। आखिर "संविधान" भी कोई चीज है।

जरूरत पड़े तो थोड़ा कानून भी खंगाला जा सकता है, जिसमें हिंदी को उसका दर्जा दिलाने की बात कही गई है। उन नियमों का हवाला भी दिया जा सकता है। अनेक निरीक्षण समितियाँ कागजी खानापूर्ति करती हैं। उन पर भी दबाव बनाया जा सकता है।

कुछ पैसा हिंदी सुधारने के नाम पर तो खर्च होगा। हिंदी जानने वालों की पूछ तो बढ़ेगी। और यकीन मानिए। वेबसाइट पर गलती सुधारना काफी टेढ़ी खीर है, कमीशन खाने वाले नहीं कर पाएंगे। वे अभी तक कृतिदेव के पत्र को पीडीएफ में बनाकर चेंप देते हैं।

प्रकाश शर्मा

हमने पिछली एक बैठक में ये तय किया था कि हिंदी की गंभीर गलतियों को संबंधित विभाग के ध्‍यान में लाया जाएगा। कुछ प्रयासों के तहत मैंने शुरुआत में सुयश जी को कुछ गलतियों के बारे में बताया भी था। कुछ गलतियां सुयश भाई ने खुद भी निकाली थीं। लेकिन इससे आगे कुछ खास प्रगति नहीं हो सकी। मेट्रो के एक अधिकारी का आश्वासन कोरा आश्‍वासन ही रह गया। और वही पुरानी गलतियां आज भी दिखाई देती हैं।

लेकिन हम अपनी पकड़ मीडिया या प्रेस तक दमदार रूप से कैसे बनाएं? हम जिन मुद्दों पर काम करें, उन्‍हें मीडिया भी नोटिस करे और अपने प्रकाशनों, कार्यक्रमों आदि में जगह दे।

हम अलग-अलग विचारों वाले व्‍यक्ति हैं। लेकिन यहां हमारा उद्देश्‍य कमोबेश एक ही है। अनुवाद विधा और हिंदी भाषा को सम्‍मानजनक स्‍थान दिलाना।

मैंने एक बात महसूस की है कि सरकारी दफ्तरों में अनुवादकों को अधिकांशत: कॉन्‍ट्रैक्‍ट पर ही रखा जा रहा है। और उस पर भी अधिकारियों और अनुवादकों के बीच एक ठेकेदार विराजमान होता है।

यहां अनुवादकों का बहुत बुरी तरह से शोषण होता है, इस बारे में जानकारी किसे और कैसे उपलब्ध कराई जाए। यानी सरकारी कंपनी तनख्‍वाह का चेक ठेकेदार के नाम बनाती है और ठेकेदार से अनुवादक को पैसे मिलते हैं।

और अब तो नौबत ये आ चुकी है कि ठेकेदार कंपनियां अनुवादकों को फ्रीलांस के रूप में एक-दो महीने रहने का न्‍यौता तक भेज रही हैं और वो भी बेहद कम दामों पर।

सरकारी स्‍तर पर मैंने जो महसूस किया है वो ये है कि वहां अफसर वही काम करने को लालायित होते हैं, जिनमें उन्‍हें कुछ कमीशन मिलता हो और लोक कल्‍याण के कामों से उन्‍हें कोई वास्‍ता नहीं है।

सीधा-सीधा खेल सरकारी महकमों में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार का है।

दबाव का काम केवल मीडिया के ज़रिए ही किया जा सकता है।

विनोद शर्मा

सवाल यही है सरकारी विभागों में इच्छा शक्ति की कमी है। अनुवाद विषय को कोई भी महत्व नहीं देता है।

संसदीय राजभाषा समिति केवल एक दिखावटी समिति है जिसके सदस्यों का काम जगह-जगह की यात्राएँ करना और 5-सितारा होटलों में दावत उड़ाना है।

मित्रो, समस्या नजरिया बदले जाने की है। आज के तथाकथित आधुनिक समाज में हिंदी की बात करने वाले को प्रतिगामी समझा जाता है। किसी लकीर को छोटा करने का सबसे अच्छा उपाय होता है उसके बराबर एक बड़ी लकीर बना देना। इसलिए हिंदी के अधिकाधिक प्रयोग को बढ़ावा देना होगा, तभी लोगों का नजरिया बदलेगा।

कल के लिए मेरे सुझाव- 1. प्रिंट मीडिया में सरकारों/विभागों/मंत्रालयों द्वारा मुद्रित सूचनाओं, अधिसूचनाओं, विज्ञप्तियों की समीक्षा सतत रूप से की जाए। जहाँ केवल अंग्रेजी भाषा का ही माध्यम चुना गया है, उस मामले में अनुवादक संघ की ओर से एक विरोध संबंधित कार्यालय को भेजा जाए। 2. हिंदी में प्रकाशित सामग्री में यदि भाषा संबंधी विसंगतियाँ पाई जाती हैं तो उन्हें भी इसी प्रकार से संबंधित कार्यालय के संज्ञान में लाया जाए। 3. कंपनियों के विज्ञापन यदि केवल अंग्रेजी में हैं तो संबंधित कंपनी को हिंदी का उपयोग करने के लिए लिखा जाए क्योंकि 95 प्रतिशत लोग अंग्रेजी नहीं समझते। 4. सरकारी विज्ञापनों, बैनरों आदि में यदि केवल अंग्रेजी का प्रयोग हुआ है तो संबंधित विभाग/कार्यालय को लिखा जाए। 5. इस तरह के कार्य हिंदी अनुवादक संघ का कोई भी सक्रिय सदस्य कर सकता है, भेजी जाने वाली ईमेल की एक प्रति अनुवादक संघ को अवश्य दी जाए।

प्रभात रंजन

आजकल तो हालत और भी बुरी हो गई है। हाल में एक मंत्रालय ने मुझसे कहा कि अनुवाद का सम्पादन कर दीजिये। जब अनुवाद आया मेरे पास तो अनुवादक ने गूगल ट्रांसलेशन से अनुवाद कर रखा था। एक भी वाक्य हिन्दी की प्रकृति के हिसाब से नहीं था। पूरा अनुवाद कर देना सम्पादन से अधिक आसान लगा।