गुरुवार, 23 मई 2013

Official language or national language? (द हिंदू से साभार)



KULDEEP KUMAR



The terminology used in Sanskritized official Hindi is as unintelligible to the common man as English, defeating its very purpose.

A friend has drawn my attention to a May 1, 2013 order of the Supreme Court that set aside punishment given to an employee of the Indian Navy because, despite his repeated requests, he was denied the chargesheet against him in Hindi. My friend was elated as he saw in it a much-deserved victory for the “rashtrabhasha” — the national language — Hindi. He is not a typical Hindiwallah. He in fact happens to be the grandson of Mahadev Desai, Mahatma Gandhi’s personal secretary for 25 years but who, in anthropologist Verrier Elwin’s words, “was much more than that”. He was also “Gandhi’s Boswell” who recorded his words and presented his master’s voice to the world. As the Mahatma’s grandson and historian Rajmohan Gandhi observes, “Waking up before Gandhi in pre-dawn darkness, and going to sleep long after his Master, Desai lived Gandhi's day thrice over — first in an attempt to anticipate it, next in spending it alongside Gandhi, and finally in recording it into his diary.” My friend, unlike many others, has not discarded the core values of our national movement cherished by his grandfather and other family members. Promotion of Hindi or Hindustani is one of them.

While Mahatma Gandhi and Jawaharlal Nehru were in favour of Hindustani that would derive its sustenance from both Hindi and Urdu and would be intelligible to the man on the street, there were others in the Congress who were not in agreement. In the Constituent Assembly, Hindi zealots led by Seth Govind Das and Purushottam Das Tandon won the day and the government of free India was committed to adopt Hindi as its official language in addition to English with the provision that the use of English would be scaled down and finally stopped in 1965. Hindi enthusiasts began to refer to Hindi as India’s sole national language.

As I have mentioned in an earlier column, Hindi had acted as a uniting force during the national movement and thousands of people in South India learnt Hindi as a result of the missionary work done by Dakshin Bharat Hindi Prachar Samiti. But, after independence, the overzealous Hindi enthusiasts antagonized speakers of other Indian languages as they tried to replace English by Hindi as the language of political dominance. The 1967 Angrezi Hatao (Remove English) Movement launched by socialist leader Ram Manohar Lohia and his followers added fuel to fire and anti-Hindi agitations flared up in the South, especially in Tamil Nadu. Speakers of ancient and rich languages like Tamil could not bring themselves to accept Hindi as the national language while their own languages were relegated to the status of being merely ‘regional’.

While Lohia advocated the use of regional languages in the lower and district courts, he was in favour of the use of Hindustani in the higher judiciary. However, he, for some inexplicable reason, forgot that Hindi and not Hindustani had been accepted as the official language of the central government. As Hindi lacked an evolved terminology, the Constitution mandated it to create it by borrowing words from the Sanskrit stock, paving the way for officially-sanctioned Sanskritized Hindi. This has resulted in the creation of an artificial language that is as unintelligible to the common man as English, thus defeating the very purpose of the exercise.

However, the government and its various limbs remain completely oblivious of their constitutional obligations. Mithilesh Kumar Singh, an employee of the Navy, wanted to be served the chargesheet in Hindi so that he could defend himself adequately before the inquiry panel. However, his requests were repeatedly ignored by a callous government. Not only that, he failed to get relief from the Central Administrative Tribunal and the High Court. Finally, counsel Pyoli fought his case ably before the Supreme Court whose two-member bench consisting of Justices H.L. Dattu and Jagdish Singh Khehar on May 1, 2013 quashed the departmental orders to punish him and granted him relief.

One hopes that Singh will be able to decipher the chargesheet in Hindi as the official version of the language is generally incomprehensible.


द हिंदू से साभार

शनिवार, 11 मई 2013

अनुवाद से संबंधित विज्ञप्ति (हस्तक्षेप से साभार)

वर्धा। महात्‍मा गांधी अन्तर्राष्‍ट्रीय हिन्दी विश्‍वविद्यालय के अनुवाद एवम् निर्वचन विद्यापीठ के अधिष्‍ठाता प्रो. देवराज का कहना है कि अनुवाद दो भिन्‍न संस्‍कृतियों को जोड़ने का माध्‍यम है। भारतीय अस्मिता की पहचान बनाने के लिये अनुवाद एक महत्‍वपूर्ण साधन के रूप में उभर रहा है। अनुवाद के क्षेत्र में रोजगार की वैश्विक संभावनायें और बढ़ रही हैं।

सूचना प्रौद्योगिकी के विकास में अनुवाद की भूमिका पर प्रो. देवराज का मानना है कि सूचना प्रौद्योगिकी के विकास के साथ जीवन के विभिन्‍न क्षेत्रों में विकास की गति तेज हुयी है तथा वैश्‍वीकरण की शक्तियों ने हर क्षेत्र को प्रभावित किया है। इससे अकादमिक जगत भी अछूता नहीं रहा है। परिणाम यह हुआ कि सूचना प्रौद्योगिकी के माध्‍यम से आज विभिन्‍न क्षेत्रों में विविध स्‍थानों पर किये जा रहे शोध को हम अपने डेस्‍कटॉप पर देख सकते हैं और उसकी समीक्षा कर सकते हैं। उन्‍होंने कहा कि विभिन्‍न भाषाओं में किये जाने वाले शोध को हिन्दी एवम् अन्‍य भारतीय भाषाओं के माध्‍यम से सबके लिये उपलब्‍ध कराना होगा। इस कार्य के लिये अनुवाद तथा अनुवाद प्रौद्योगिकी का सहारा देना होगा। विश्‍वविद्यालय में स्‍थापित अनुवाद प्रौद्योगिकी विभाग इस कार्य को आगे बढ़ाने के लिये तत्‍पर है।

अनुवाद में रोजगार की सम्भावनाओं का जिक्र करते हुये प्रो. देवराज ने कहा कि अनुवाद का पाठयक्रम पूरा करने पर राष्‍ट्रीय एवम् अन्तर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर अनुवादक व दुभाषिये के रूप में रोजगार की अपार सम्भावनायें हैं। इससे इतर शैक्षणिक संस्‍थानों में राष्‍ट्रीय, अन्तर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर अनुवादक एवम् दुभाषिये के रूप में, शैक्षणिक संस्‍थानों में अध्‍यापन के क्षेत्र में, राजभाषा अधिकारी के रूप में, बी.पी.ओ. एवम् कॉल सेन्टर में विदेशी भाषा इन्टरप्रेटर के रूप में, पर्यटन उद्योग एवम् होटल प्रबन्धन के क्षेत्र में, अनुवाद प्रौद्योगिकी क्षेत्र में मशीनी अनुवाद और सिनेमेटिक अनुवाद का कार्य, फिल्‍म एवम् टी.वी. में अनुवादक के रूप में, पत्रकारिता में अनुवादक के रूप में रोजगार की असीम सम्भावनायें हैं।

विश्‍वविद्यालय के अनुवाद प्रौद्योगिकी विभाग के बारे में उन्‍होंने कहा कि वैश्वीकरण के इस दौर में राष्‍ट्रीय एवम् अन्तर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर दिन-प्रति दिन अनुवाद की महत्‍ता बढ़ती जा रही है। इसे बहुआयामी एवम् स्‍वायत्‍त अनुशासन के रूप में पहचान मिल चुकी है, इसीलिये विश्‍वविद्यालय में अनुवाद एवम् निर्वचन विद्यापीठ प्रारम्भ हुआ। यह विद्यापीठ समस्‍त विश्‍वविद्यालयों में अद्वितीय है और इसके अन्तर्गत कार्यरत अनुवाद प्रौद्योगिकी विभाग देश का एकमात्र ऐसा विभाग है, जो अनुवाद की तकनीकी, प्रणालीगत और रोजगारपरक संभावनाओं को यथार्थ में परिणत करने के लिये सतत प्रयासरत है। ज्ञात हो कि इस विभाग द्वारा अनुवाद प्रौद्योगिकी में एम.ए., एम.फिल. तथा पीएच. डी. तथा हिन्दी अनुवाद में एक वर्षीय स्‍नातकोत्‍तर डिप्‍लोमा, प्रयोजनमूलक हिन्दी और अनुवाद में एक वर्षीय स्‍नातकोत्‍तर डिप्‍लोमा, निर्वचन में एम वर्षीय स्‍नातकोत्‍तर डिप्‍लोमा आदि पाठयक्रम संचालित किये जा रहे हैं। विभाग के छात्र नेट और जेआरएफ में भी सफल हो रहे हैं। जिससे वे उक्‍त पाठयक्रम पूरा करने पर विभिन्‍न संस्‍थानों में रोजगार पा रहे हैं। सी. डैक, बैंक, आईआईटी, एसएनडीटी, मुम्बई जैसे संस्‍थानों में इस विभाग के छात्र कार्यरत हैं।


भविष्‍य की योजनाओं के बारे में प्रो. देवराज का कहना है कि हम अनुवादकों का डाटाबेस बना रहे हैं जिससे अनुवादकों की एक राष्‍ट्रीय सूची तैयार होगी और अन्‍य भाषाओं से हिन्दी में अनुवाद करने के लिये यह सूची आधार बनेगी। विभाग द्वारा ज्ञान सर्जन केन्द्र बनाने की पहल की जा रही है जिसके द्वारा से विज्ञान, समाज विज्ञान एवम् मानविकी विषयों से जुड़े शोध अनुवाद के माध्‍यम से हिन्दी में उपलब्‍ध हो सकेंगे।

हस्तक्षेप से साभार

सोमवार, 29 अप्रैल 2013

वर्चस्व के इलाके (लेखक : गंगा सहाय मीणा)

अस्मितावादी विमर्शों के दौर में भाषा का सवाल एक बार फिर प्रासंगिक हो गया है। इसके कुछ समकालीन संदर्भ भी हैं- भारत में अंग्रेजी-विरोधी मुहिम के पुरोधा और समाजवादी आंदोलन के अग्रणी नेता राममनोहर
लोहिया को अपना आदर्श मानने वाली समाजवादी पार्टी के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने विद्यार्थियों को लैपटॉप बांटने के दौरान कंप्यूटर-तकनीक के साथ अंग्रेजी से दोस्ती की जरूरत पर बल दिया। अधिकतर दलित चिंतक अंग्रेजी को मुक्ति का पर्याय मान रहे हैं। भाषाओं की स्थिति को दर्शाने वाले यूनेस्को के ‘इंटरेक्टिव एटलस’ के मुताबिक भारत की कई भाषाएं बेहद खतरे में हैं। उनमें से अधिकतर भाषाओं का संबंध आदिवासी समाज से है, इसलिए आदिवासी मामलों के अध्येता इसे खतरे की घंटी बता रहे हैं। सारे संदर्भों से मूल सवाल यह निकल रहा है कि भाषाओं का सामुदायिक मुक्ति से क्या संबंध है और क्या भूमंडलीकरण के दौर में
भाषाओं की मुक्ति का मुद्दा प्रासंगिक है?

औपनिवेशिक मानसिकता की वजह से, लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रवेश के बाद भी भारतीय मानस में अपनी मातृभाषाओं के प्रति हीनताबोध और अंग्रेजी को लेकर श्रेष्ठताबोध जारी रहा। भारतीय संविधान ने इसे वैधता प्रदान कर दी और विभिन्न संविधान संशोधनों के जरिए आगे भी यह सिलसिला चलता रहा, जिसके फलस्वरूप अंग्रेजी वर्चस्व और श्रेष्ठताबोध की भाषा बनी रही। अनेक देशों में यह प्रक्रिया कमोबेश इसी रूप में चली, जिसके परिणामस्वरूप धीरे-धीरे अंग्रेजी दुनिया की संपर्क भाषा के रूप में विकसित होने लगी।

आजादी के बाद लगभग दो दशक तक भारतीय समाज और राजनीति में भाषा का प्रश्न छाया रहा। हिंदी को भारत की राजभाषा बनाने का गैर-हिंदीभाषी राज्यों, खासकर दक्षिण भारतीय राज्यों में जमकर विरोध हुआ और विरोध की राजनीति भी हुई। उसी दौर में उत्तर भारत में डॉ. राममनोहर लोहिया के नेतृत्व में अंग्रेजी को सह-राजभाषा बनाए जाने के विरोध में बड़ी संख्या में लोग लामबंद हुए। लोहिया जब अंग्रेजी हटाने की बात करते थे तो उसका मतलब हिंदी लाना नहीं था। वे भारतीय जनता पर थोप दी गई अंग्रेजी के स्थान पर सभी भारतीय भाषाओं को प्रतिष्ठा दिलाने के पक्षधर थे। भाषा का सवाल उनके लिए पेट का सवाल था। वे ‘पेट और दिमाग’ के सवालों को आपस में जुड़ा हुआ मानते थे। खुद को लोहिया का अनुयायी कहने वाले समाजवादी
पार्टी के नेतृत्व की भाषा-नीति में बदलाव को लोहिया की भाषा-नीति के अप्रासंगिक होने के रूप में नहीं, बल्कि ‘समाजवादियों’ की राजनीति में बदलाव के एक अंग के रूप में देखा जाना चाहिए।

दलित चिंतकों द्वारा नई आर्थिक व्यवस्था को मुक्ति की विचारधारा और इसी क्रम में अंग्रेजी को मुक्ति की भाषा कहा जाना कई सवाल खड़े करता है। हिंदी अकादमिक जगत में वैश्विक पूंजीवाद को लेकर मतभिन्नता या संशय दिख सकता है, लेकिन भाषा के मसले पर व्यापक आम सहमति है कि अंग्रेजी शोषण की भाषा है और हिंदी को उससे भारी खतरा है। दलित विमर्श इसकी विरोधी राय लेकर आया है। क्या दलित चिंतकों की
इस बात से सहमत हुआ जा सकता है कि अंग्रेजी मुक्ति की भाषा है? किसी भाषा के मुक्ति या शोषण की भाषा होने के सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ होते हैं। भारतीय संदर्भ में सरकारी नीतियों के कारण रोजगार और प्रतिष्ठा की भाषा होने के कारण अंग्रेजी ज्ञान प्राप्त कर चुके दलितों (हालांकि इनकी संख्या बहुत कम है) को
उन पारंपरिक पेशों से मुक्ति मिली है, जो सदियों से उनके शोषण का कारण बने हुए थे। चूंकि हिंदी ने दलितों के संदर्भ में ऐसी कोई भूमिका नहीं अदा की, शायद इसलिए दलितों को अंग्रेजी मुक्ति की भाषा नजर आती है।

अब सवाल है कि हिंदी के खतरे में होने की आशंका में कितनी सच्चाई है? अगर हम भारत और विश्व के आंकड़े देखें तो पाएंगे कि हिंदी बोलने वालों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। धीरे-धीरे हिंदी बाजार की भाषा के रूप में भी विकसित हो रही है। पर यह कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि अंग्रेजी की तरह हिंदी भी वर्चस्ववादी भाषा है- अपनी जुड़वां बहन उर्दू, सगी बहनों, पूर्वोत्तर भारत की भाषाओं, दक्षिण की भाषाओं और देश की तमाम आदिवासी भाषाओं के लिए। इन सब भाषाओं को अंग्रेजी के साथ और अंग्रेजी से अधिक हिंदी प्रतिस्थापित कर रही है। हम सब अपनी मातृभाषाएं छोड़ कर हिंदी अपना रहे हैं, अंग्रेजी नहीं।

आदिवासी विमर्श में मुक्ति की भाषा का संदर्भ और इसकी समझ दलित विमर्श से एकदम भिन्न है। आज देश के आदिवासी बेहद कठिन दौर में जी रहे हैं और अपने अस्तित्व तथा अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्षरत हैं। जिन तत्त्वों से आदिवासी अस्मिता परिभाषित होती है, उनमें उनकी विशिष्ट भाषा भी एक प्रमुख तत्त्व है। इसलिए आदिवासी भाषाओं को बचाने का सवाल आदिवासी विमर्श का एक अहम मुद्दा है। हिंदी किसी आदिवासी की मातृभाषा नहीं है, इसलिए ‘हिंदी के समक्ष उपस्थित खतरा’ या हिंदी की मुक्ति का प्रश्न आदिवासी विमर्श के किसी काम का नहीं है। ईसाई धर्म ग्रहण करने के बाद आदिवासियों ने अंग्रेजी के रास्ते तथाकथित मुख्यधारा में जगह बनाना शुरू किया। इसलिए अंग्रेजी से उनका ऐसा कोई वैरभाव भी नहीं है, जैसा हिंदी-हितैषियों का है। अंग्रेजी के प्रभाव में वे अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी से हैं। इसके बावजूद उन्होंने अपनी भाषाओं को बचाए रखा।

आज आदिवासियों की मूल चिंता अपनी भाषा को बचाने की है। आदिवासी भाषाओं के सामने अंग्रेजी और हिंदी, दोनों ने ही अस्तित्त्व की चुनौती खड़ी   कर दी है। एक आदिवासी भाषा का मरना हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता, उसकी स्मृति और ज्ञान परंपरा का खत्म होना है। इसलिए भारतीय संदर्भ में अंग्रेजी और हिंदी के
वर्चस्व से आदिवासी भाषाओं की मुक्ति जरूरी है।

मुक्ति की भाषा के सवाल से लेकर भाषाओं की मुक्ति के संदर्भ तक चीजों को ठीक से समझने और सावधानी बरतने की जरूरत है। जिस तरह वैश्विक पूंजीवाद और अमेरिकी साम्राज्यवाद गरीबों के हक की विचारधारा और व्यवस्था नहीं है, उसी तरह अंग्रेजी बहुत सीमित संदर्भों में ही वंचितों के हित की भाषा हो सकती है।
दूसरी बात यह कि जैसे अंग्रेजों के शोषण के अलावा सामंती, जातिवादी और लैंगिक शोषण भारतीय समाज का सच है, वैसे ही छोटी और आदिवासी भाषाओं के संदर्भ में अंग्रेजी के अलावा हिंदी के वर्चस्व का सच भी हमें स्वीकार करना चाहिए। बाजार और सत्ता द्वारा निर्मित मुक्ति के संदर्भ स्थायी महत्त्व के नहीं हैं, इसलिए
इनके प्रति सतर्कता अपेक्षित है। अगर हम सचमुच अपनी भाषाओं को बचाना चाहते हैं तो उनका व्यवहार जारी रखने के लिए उन्हें रोजगार से जोड़ना और उचित सम्मान देना होगा।

जनसत्ता से साभार

मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

अनुवाद से संबंधित 100 महत्वपूर्ण ब्लॉग

इंटरनेट के आने के बाद स्वतंत्र अनुवादकों का एक ऐसा समूह सामने आया है जिसने अनुवाद को उसके परंपरागत क्षेत्र से बाहर निकालकर सार्वजनिक जीवन के बड़े दायरे से जोड़ने का काम किया है। अपनी भाषा, संस्कृति और पेशे के प्रति सजग अनुवादक ब्लॉग के माध्यम से उन पाठकों से भी संवाद स्थापित कर रहे हैं जो अनुवाद की जटिलताओं से अपरिचित हैं। अब अनुवादक घर बैठे विदेशी एजेंसियों और क्लाइंटों के लिए काम कर सकते हैं। ब्लॉग से उन्हें इंटरनेट पर अपनी अच्छी छवि बनाने में भी मदद मिलती है।

अनुवाद से संबंधित 100 महत्वपूर्ण ब्लॉगों की सूची नीचे प्रस्तुत है :




































































































100. http://sjcparis.wordpress.com

आप मेरा ब्लॉग यहाँ देख सकते हैं।

बुधवार, 3 अप्रैल 2013

फ्रीलांसिंग से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें... (लेखक : आशुतोष मित्रा)


फ्रीलांसिंग से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण बातें जिनको जानना हमारे लिये बेहद जरूरी है...
                   

फ्रीलांसर होने का विचार बहुत से लोगों को आकर्षित करता है। जब आप अपने आसपास के लोगों को अपने इस पेशे के बारे में बताते(ती) हैं तो उनको एक ऐसा दृश्य दिखता है जिसमें आपके आसपास धन की नदी प्रवाहित हो रही होती है और आप अपने आरामदायक कपड़ों में ढ़ेर सारे ग्राहकों से घिरे(री) बैठे(ठी) दिखते(ती) हैं।
यह सही है कि फ्रीलांसर होने के अपने फायदे हैं। आप अपने काम के घंटे खुद निर्धारित कर सकते(ती) हैंअपने घर से काम कर सकते(ती) हैं और अपनी रचनात्मकता के घोड़े दौड़ा सकते(ती) हैं।
लेकिन आपको तो फ्रीलांस करने के इन फायदों के बारे में पहले से ही जानकारी थी। यही तो वो कारण था जिसने आपको फ्रीलांसिंग में कूदने के लिये प्रेरित किया था।
और कमियों का क्या? क्या आपको उनकी जानकारी है?
मित्रोंअपने आपको कैरियर के इन झटकों से बचाइये और इससे पहले कि बहुत देर हो जाये इसे पढ़िये…….

1.    पहला महीना बेहद दर्दभरी यंत्रणा वाला होगा-
एक दिन सुबह आप सोकर उठते(ती) हैं और अचानक आपको भान होता है कि आपने अपनी नौकरी छोड़ दी है। आप यह सोच कर भय से भर जाते(ती) हैं कि क्या आप कमा पायेगें(गीं)?
आपको बड़ा असहज सा लगता है क्योंकि आपने अभी तक अपने काम करने के तरीके को कोई आकार नहीं दिया है। ये भी संभव है कि आप अपने काम छोड़ने के निर्णय को लानत मलामत भेजने लगें।
क्या करें :  
पहले मन को शांत करिये और एक कागज और कलम उठा लीजिये ताकि आप एक संभावित कार्यसूची बना सकें। निम्नलिखित चीज़ों के लिये निश्चित समय निर्धारित करिये:
Ø अपने ब्रांड/काम के बारे में चिंतन करने के लिये
Ø अपनी कंपनी/कौशल से संबंधित सामग्री का निर्माण कररने के लिये (वेबसाइटअनुबंध और बिज़नेस कार्ड आदि)
Ø अपनी सेवाओं के विपणन (मार्केटिंग) के लिये
Ø कार्य संबंधी सभी औपचारिक व अनौपचारिक मामलों का व्यावहारिक विवरण तैयार करने के लिये
यह संभव है कि आप कभी-कभार इस कार्य-सूची को भूल जायें या सब गड्डमड्ड कर देंलेकिन अपने जीवन में संगठित होने के लिये उठाये गये छोटे-छोटे कदम आपकी मानसिक शांति के लिये चमत्कार जैसे साबित हो सकते हैं।
2. जिस तरह से अच्छे ग्राहक मौजूद हैं ठीक उसी तरह बुरे भी और वे आपको इस्तेमाल करने का प्रयास भी करेंगे-
फ्रीलांसिग कोई आसान काम नहीं है और इसमें जबरदस्त प्रतिस्पर्धा हैबुरे ग्राहक इसको और कठिन बना देते हैं। ये बुरे ग्राहक जानबूझ कर आपका लाभ उठाना चाहेंगे।
ऐसे ग्राहक हैं जो:
Ø पहले तो आपको अच्छा पारिश्रमिक देने का प्रस्ताव देंगे और परियोजना (प्रोजेक्ट) पूरा करने के बाद जब आप उसे उनको सौंप देंगे तो वो ऐसे गायब हो जायेंगे जैसे कि गधे के सिर से सींग।
Ø आपसेपहले से सहमत परियोजना (प्रोजेक्ट) विवरण से बाहर जाकर काम करने की मांग करेंगे।
Ø आपसे अपने पारिश्रमिक की दर कम करने को कहेंगे।
Ø बिना भुगतान करेकिये गये काम को आपसे तीन-तीन बार संशोधित करने के लिये कहेंगे।
क्या करें :  
इसमें तीन कारक शामिल हैंइसलिये....
Ø अपने ग्राहकों से वास्तविक संपर्क साधने में कुछ समय लगाइये। उनके साथ पेशेवर तरीके से संबंध बनाइये। जब उनकी जरूरत हो तो कुशल सुझाव दीजिये। उनको संदेश देते रहिये और उनकी परियोजना (प्रोजेक्ट) की प्रगति के बारे में सूचित करते रहिये।
Ø अपने और अपने ग्राहक के बीच एक अच्छे कानूनी अनुबंध के निर्माण में कुछ निवेश करिये। आपसी समझौते के अनुसार हर एक अनुबंध का अनुकूलन करिये। ध्यान रखिये कि इस अनुबंध की भाषा सरल और सहज हो जिससे कि आपका ग्राहक उसकी मूल भावना को समझ सके।
Ø इस अनुबंध में बिल करने और उसका भुगतान करने के लिये भी शर्तें शामिल करिये। खूब सारी मेहनत करकेपसीना बहाकर परियोजना (प्रोजेक्ट) को पूरा करने के बाद भुगतान की उम्मीद के उत्तर में ग्राहक से यह सुनना आपको बुरा लग सकता है कि भुगतान की तो कोई बात अनुबंध में थी ही नहीं...

Ø देर से भुगतान करने और असीमित मांग करने वाले कुख्यात ग्राहकों से  करना सीखिये।

   बेहतर यह होगा कि आप उस और कौशल को किसी और ग्राहक पर खर्च करें। 

3.   अगर दावत उड़ा रहे(ही) हैं तो फाँके भी पड़ेंगे। ऐसा कभी भी हो सकता है।
एक दिन आपके पास परियोजनाओं (प्रोजेक्ट) की इतनी भीड़ होगी कि आपके लिये खाने-पीने का समय निकालना भी कठिन हो जायेगा और ठीक अगले दिन आपके पास एक भी परियोजना (प्रोजेक्ट) न होगी। फ्रीलांसर की दुनिया अनिश्चितताओं से भरी है। दावत और फाँका कभी भी हो सकता है। कहा भी जाता है कि ग्राहक और मौत का कोई भरोसा नहीं है।  
क्या करें : 
बस यहीं पर अनुशासन सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। अगर आपको लगता है कि फ्रीलांसर होने का अर्थ केवल रचनात्मक काम करना और इस बात इंतज़ार करना है कि ग्राहक आप तक पहुंचे तो एक बार फिर से सोचिये...
फ्रीलांसर मूलतः उद्यमशील होते हैं। हम अपनी खुद की कंपनी चलाते हैं।
Ø  अपनी दैनिक कार्यसूची में विपणन (मार्केटिंग) और नेटवर्किंग के लिये समय निर्धारित करिये। सोशल मीडिया मंचों के माध्यम से अपने ग्राहकों (या संभावित ग्राहकों) से जुड़ियेउनके साथ उनके कामकाज की चर्चा करिये और पेशेवर तरीके से मित्रवत रहिये (उनके समय और मूल शिष्टाचार का ध्यान रखते हुये)। तीन या पाँच लोगों के साथ शुरुआत करिये।
Ø  आप बस शुरु कर रहे(ही) हैंउन साइटों पर जाकर बोली (बिडिंग) लगाइयेजिससे कि आपके पास कुछ ऐसी परियोजनायें (प्रोजेक्ट) हों जिनको आप अपने आत्म-परिचय (पोर्टफोलियो) में दर्शा सकें। कम से कम तीन परियोजनाओं (प्रोजेक्ट) पर रोज़ बोली (बिडिंग) लगाने का नियम बनाइये; और हाँ यह सब करते हुयेध्यान रखिये कि खराब ग्राहकों से दूरी बनी रहे।
Ø  जब भी आपको आमदनी हो तो उसका दस प्रतिशत अपनी आकस्मिक निधि (इमरजेंसी फंड) के रूप में अलग रखियेयह निधि फाँके के समय काम आयेगी। ऐसी आदत कतई मत डालिये कि आपके सामने जो भी परियोजना प्रस्ताव आये आप उसे स्वीकार करते(ती) जायें जिससे कि आप अपने खर्च पूरे करते(ती) रहें। ऐसा किया और आप खराब ग्राहकों के चंगुल में फंसे(सी)।


4.  अपने घर के दफ़्तर में हर रोज़पूरे समय बैठे रहना आपको उबा देगाअकेलेपन का  एहसास देगा और साथ ही बीमार भी कर देगा-


                                           

शुरु के कुछ महीनों में आपको फ्रीलांसिंग से प्रेम हो जायेगा। आपको देर से सोकर उठनाइत्मीनान के साथ नाश्ता करना और अपने आरामदायक कपड़ों में टहलना अच्छा लगेगा। आपको अपना वह काम करने में मज़ा आयेगाजिससे आप प्रेम करते(ती) हैं और उन ग्राहकों से बात करने में आनंद आयेगाजिनको आप पसंद करते(ती) हैं।
आप खुद को उड़ान भरती चिड़िया जैसा समझेंगे(गी)।
लेकिन अंततः एक खराब दोस्ती की तरह आपको एक पिंजरे में बंद चिड़िया जैसा एहसास होगा। ऐसा तब होगा जब आप फ्रीलांसिंग नाम के उड़नखटोले पर सावधानी के साथ सवारी नहीं करेंगे(गी)।
क्या करें :
Ø  अपने ऑफिस को विविधता प्रदान करिये। फ्रीलांसर होने का अर्थ है कि आपका अपना ऑफिसचलता-फिरता भी हो सकता है। आप अपना लैपटॉप लेकर कहीं भी जा सकते(ती) हैं और कहीं से भी काम कर सकते(ती) हैं। आपको घर पर जमे रहने की कतई ज़रूरत नहीं है। जहाँ मर्जी हो वहाँ बैठ कर काम करिये...शांत कॉफी या चाय शॉप (अगर मिले) में बैठिये और कॉफी/चाय की चुस्कियों के साथ काम का आनंद लीजिये या फिर लाइब्रेरी और हरे भरे शांत पार्क में बैठ कर काम करिये।
Ø  घर से बाहर निकल कर थोड़ा मेलजोल बढ़ाइये। फ्रीलांसर के लिये यह महत्वपूर्ण है कि वह काम और मौज-मस्ती के बीच संतुलन कायम करे। इसका यह कतई मतलब नही है कि काम को गंभीरता से न लें...बात तो बस एक दिल खुश कर देने वाले संयोजन की है।
Ø  व्यायाम... इस शब्द के साथ आपके दिमाग़ में क्या दृश्य उभरा? आपको जिम के सपने आने लगे...लेकिन ऐसा कुछ नहीं है...पहले फ्रीलांसिंग करके कुछ अतिरिक्त कमाने लायक बनिये फिर खर्चे बढ़ाइये। एक काम सभी बखूबी कर सकते हैं और वो है...हल्का फुल्का नृत्य या जॉगिंग या फिर योग; और अगर खर्च ही करना है तो जिम से अधिक जरूरी है स्वास्थ्य बीमा”…

5.    आप थक-हार सकते(ती) हैं और बुरी तरह से पस्त हो सकते(ती) हैं लेकिन आप इसके बाहर आ जायेंगे(गी)-    
यह पेशा काफी चुनौतीपूर्ण है। अपने खुद के फ्रीलांस व्यवसाय को पंजीकृत करने के साथ-साथविपणन (मार्केटिंग) करनाआयकर रिटर्न दाखिल करनाबीमा लेनाविलंबित हो गये भुगतानों के लिये प्रयास करना और हाँ....अपना वास्तविक काम  करनाइन सब को करने के तनाव के साथ यह तनाव कि आप अच्छा काम कर रहे(ही) है या नहीं...आप पर हावी भी हो सकता है।
ग्राहक आपके काम को नापसंद कर सकते हैंआपको काम देने वाले नहीं मिल सकते हैं...और हाँ आपको भुगतान न मिलना भी आपको ही भुगतना पड़ेगा।
कभी-कभी आपको लग सकता है कि ..अमां कहां फंस गये...गुरु निकल लिया जाये...ये अपने बस का नहीं है।
क्या करें :
Ø अपने दिल के नज़दीक विषयों के आधार पर अपना बेहतरीन कौशल चुनिये। उन चीज़ों के बारे में लिखिये जो आपको प्रेरित करती हैं जिससे कि जब फांके का दौर चल रहा हो तो भी आप व्यस्त रहें और मस्त रहें। अपनी कला से प्रेम करिये। हमेशा ध्यान रखिये कि आपने बेहतर ज़िंदगी और बेहतर समय की तलाश में फ्रीलांसिग को चुना है।
Ø आत्मविश्वास कायम रखिये। हमें पता है कि ऐसा कहना आसान है लेकिन सुनहरा नियम यह है कि सफल फ्रीलांसर के लिये आत्मविश्वास से भरपूर होना पहला गुण है। सूझाव देने और त्रुटियों को सुधारने से झिझकिये मत। अच्छे ग्राहक हमेशा उनके पास आते हैं जिनको पता होता है कि वे क्या कर रहे(ही) हैं।
Ø कुछ ग्राहक आपको खराब प्रतिक्रिया देंगे और कुछ लोग आपका गुणगान करेंगे। अगर आप जानते(ती) हैं कि आपने अपना सर्वश्रेष्ठ दिया है लेकिन फिर भी ग्राहक आपको खराब प्रतिक्रिया दे रहा है तो ऐसे ग्राहक को जाने दीजिये। अनुभव से सीखिये और मुस्कुरा कर इससे उबर जाइये...याद रखिये आप सर्वश्रेष्ठ देकर भी सभी को संतुष्ट नहीं कर सकते(ती) हैं।
फ्रीलांसर होने के अपने लाभ और हानियां हैंलेकिन विश्वास करियेअंततः यह एक ऐसा बेहतरीन अनुभव है जो आपने कभी महसूस न किया होगा। आप रातों-रात सफल नहीं हो जायेंगे(गी)...लेकिन ईमानदार मेहनत का मीठा फल मिलना तय है।

फ्रीलांसिंग जैसे महत्वपूर्ण कौशल में स्थापित होने में समय लगता है।
एक बार जब आपके द्वारा निवेश किया गया समय और प्रतिभा का ईमानदार प्रयास के साथ मिलन होगा तो अंततः आपको एहसास होगा कि यह सारा प्रयास सार्थक है.... 
  

आप आशुतोष मित्रा का ब्लॉग यहाँ देख सकते हैं।

मंगलवार, 12 मार्च 2013

अनुवाद एक कला और व्‍यवसाय


अनुवाद अर्थात किसी एक भाषा के विचार अथवा पाठ को दूसरी भाषा में व्‍यक्‍त करना। अनुवाद का काम एक आदमी को देखने में जितना आसान लगता है, उतना ही वो तब मुश्‍किल हो जाता है जब वो उसे खुद करने बैठता है।

हरेक स्‍नातक जो दो भाषाओं का ज्ञान रखता है, उसे ये ग़लतफ़हमी होती है वो अनुवाद कार्य भी आसानी से कर लेगा। लेकिन स्रोत भाषा को लक्ष्‍य भाषा में बदलने का ये खेल इतना आसान नहीं है। इसे खेल न कहकर एक कला कहा जाए तो कुछ ग़लत न होगा। जहां अच्‍छे अनुवादक के लिए अनुवाद कार्य एक खेल के समान होता है वहीं उसके पाठक के लिए उसकी खूबसूरती एक कला का रूप धारण कर लेती है। अजंता एलोरा की गुफ़ाओं की मूर्तियों के रचनाकार को शायद अंदाज़ा भी न होगा कि उसे उसकी कला के ज़रिए अनंत काल तक याद किया जाता रहेगा। इसी तरह से बेहतरीन अनुवाद भी कुछ ऐसी ही अमिट छाप छोड़ता है।

साहित्‍य, शिक्षण, अनुवाद आदि ये कुछ कार्य ऐसे हैं जिसे लोग केवल सामाजिक और नैतिक कार्य समझने की भूल कर बैठते हैं या कहें एक चोला ओढ़ा देते हैं। आज के आधुनिक युग में हालांकि यह भ्रांति समाप्‍त होती जा रही है क्‍योंकि बेहतरीन शिक्षक भी आज पैसे का महत्‍व जानता है और शिक्षण के पेशे को जब वो विशुद्ध व्‍यावसायिक रूप से करने लगता है तो अपने क्षेत्र में सफलता के एक ध्‍वज का वाहक सा दिखता है। जिस शिक्षक को निजी विद्यालय के कर्ता-धर्ताओं की सात-आठ हज़ार रूपए तनख्‍वाह देते हुए जान निकलती है, जब वही शिक्षक एक कोचिंग संस्‍थान खोल कर कमाने लगता है तो उसकी वही आय चालीस पचास हज़ार को भी पार कर जाती है, जिससे उसके रहन-सहन का स्‍तर भी बढ़िया हो जाता है।

अनुवाद क्षेत्र की भी एक यही खामी है कि कुछ श्रेष्‍ठ अनुवादक एक हीन ग्रंथि से घिरे रहते हैं। सरकारी दर यदि चालीस-पचास पैसे प्रति दर है तो वे ये समझने की भूल कर बैठते हैं कि इससे ज्‍़यादा पैसे उन्‍हें देने की ज़हमत कोई नहीं उठाएगा। जबकि वहीं सफल अनुवादक अपनी दरों से समझौता किए बगैर अनुवाद क्षेत्र को एक विशुद्ध व्‍यवसायी की तरह  तरक्‍की की राह दिखाते रहते हैं, नित नए प्रतिमान गढ़ते रहते हैं। जहां उनकी दरें सम्‍मानजनक होती हैं वहीं वो स्‍वयं को अनुवाद के सभी आधुनिक उपकरणों से स्‍वयं को लैस रखते हैं। चाहे वो ट्रैडोस हो, या मेमोक्‍यू, वर्डफ़ास्‍ट हो या कोई और। कम समय में बेहतरीन काम करने की मंशा उन्‍हें अपनी और इस पेशे की तरक्‍की के कई बेहतरीन अवसर देती है जिसे वे सफलतापूर्वक भुनाते हैं और बाकियों के लिए एक मिसाल कायम कर देते हैं।

अनुवाद भाषा के साथ जुड़ा व्‍यवसाय है। अपनी हिंदी भाषा के संदर्भ में कहूं, जब अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद की बात आती है तो यह बेहद जटिल काम हो जाता है। पहला कारण यह है कि हर कोई जो हिंदी भाषा का थोड़ा-बहुत ज्ञान रखता है, वो अनुवाद में मीन-मेख निकालने से नहीं चूकता। ये शायद हम भारतीयों की आदतों में शुमार है और दूसरों की गलतियां निकालने में हम माहिर उस्‍ताद हैं। ओह, लगता है जैसे भड़ास निकाल रहा हूं! :))

ख़ैर, आधुनिक संदर्भ में तो मैं यही कहूंगा कि इक्‍कीसवीं सदी के पहले दशक में उदारीकरण के दौर ने अनुवाद के व्‍यवसाय को भी नई मंज़िलें दी हैं, नए विचार दिए हैं, अंतरराष्‍ट्रीय बाज़ार दिया है। ये बाज़ार ऐसा है जिसमें अनुवाद एक उत्‍पाद है और उसकी गुणवत्ता जितनी बेहतरीन होगी, उसकी मांग भी उतनी ही ज्‍़यादा बनी रहेगी।

यदि अनुवादक के अनुवाद की गुणवत्ता अच्‍छी है, भाषा पर पकड़ बढ़िया है, तो उसे अपनी दरों को सदा ऊंचा रखना चाहिए क्‍योंकि गुणवत्तायुक्‍त उत्‍पाद बाज़ार से हमेशा अच्‍छी कीमत पाने का अधिकारी होता है। दीगर रहे कि अनुवादक चाहे नया हो या पुराना, उसे अपनी गुणवत्ता का ज्ञान हमेशा रहना चाहिए और यदि उसे लगता है कि उसका काम इतना गुणवत्तापूर्ण है कि वह बाज़ार की मांग और भूख को पूरा कर सकता है, तो उसे अपने काम की दरें अन्‍य सामान्‍य अनुवादकों से हमेशा ज्‍़यादा ही रखनी चाहिए। एक कहावत है ना, 'महंगा रोए एक बार, सस्‍ता रोए बार-बार'। जिन्‍हें कामचलाऊ काम चाहिए, उन्‍हें सस्‍ती दरों वाले अनवुादकों की ओर जाने दें, लेकिन अगर आप बेहतरीन काम करते हैं तो ऐसे उपभोक्‍ता देखें जिन्‍हें बढ़िया काम की तलाश हो और उसके लिए वे वाजिब और अच्‍छे दाम देने में हील-हुज्‍जत न दिखाएं। अब फ़ाइव-स्‍टार होटलों की ही बात करें, तो एक ग्राहक जो शायद एक सड़कछाप ढाबे पर ज्‍़यादा पैसे की मांग पर आंखें तरेर सकता है, वहीं ग्राहक जब ऐसे फ़ाइव-स्‍टार होटलों पर पहुंचता है तो वो न केवल ज्‍़यादा पैसे देता है, बल्‍कि वेटर को टिप देने में भी ना-नुकुर नहीं करता। क्‍योंकि वहां इज्‍जत का सवाल होता है। अनुवाद के विदेशी उपभोक्‍ताओं में तो ये भावना फिर भी दिख जाती है, लेकिन अपने देशी उपभोक्‍ता यानी एजेंसियां अनुवादक को कम दरों पर काम करवाने में सफल होने पर यूं खुशी ज़ाहिर करती हैं मानो कोई किला फ़तह कर लिया हो। यानी एक तो अनवुाद के बाज़ार को ठंडा करने की कोशिश, यानी चोरी और तिस पर सीना ज़ोरी।

जैसा कि मैं पहले भी ज़िक्र कर चुका हूं कि कुछ अनुवादक न केवल अनुवाद के स्‍तर पर बल्‍कि पेशे के स्‍तर पर भी अनुवाद कार्य को भारतीय समाज में सम्‍मानजनक दर्जा दिलाने की भरपूर कोशिश में लगे हुए हैं। मेरे एक ऐसे ही मित्र हैं जो स्‍वयं अनुवादक होने के साथ-साथ, एक प्रगतिशील विचारक भी हैं। वे फ़ेसबुक के माध्‍यम से जहां प्रगतिशील विचारों को अपनी मित्र-मंडली और समूह तक पहुंचाते रहते हैं वहीं उन्‍होंने गूगल समूह का बढिया इस्तेमाल करते हुए अनुवाद क्षेत्र की हितैषी ऑनलाइन दुनिया को भी गढ़ा है। वे उस आभासी दुनिया को सार्थक रूप में देने में पूरे जी-जान से जुटे हुए हैं। उनकी ही सलाह थी कि हम अनुवादक कुछ ब्‍लॉग्‍स लिखें, जिसने मुझे ब्‍लॉग लिखने के लिए फिर से प्रोत्‍साहित किया था।

हो सकता है, आगे भी कुछ प्रेरक ब्‍लॉग्‍स लिखने का प्रयास करूं, जिसके लिए मुझे अपने मित्रों और वरिष्‍ठों के मार्गदर्शन की आवश्‍यकता रहेगी।

आपका सहृदयी मित्र,
प्रकाश शर्मा
अंग्रेज़ी-हिंदी/नेपाली/संस्‍कृत-अंग्रेजी अनुवादक
http://www.proz.com/profile/45193

आप प्रकाश शर्मा का ब्लॉग यहाँ देख सकते हैं।